यः पश्यति सः पश्यति !!

http://www.news18.com/news/buzz/cricketer-irfan-pathan-gets-trolled-again-this-time-for-celebrating-raksha-bandhan-1485773.html

link में देखिएगा कि एक ने लिखा है कि राखी की शुरुआत हीं हिंदुस्तान में तब हुई जब एक मुसलमान बादशाह (हुमायूं) को हिन्दू रानी कर्णावती (राणा सांगा की विधवा) ने राखी भेजा था और इसका हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है।  सच झूठ जो भी हो बात मज़ेदार है, क्योंकि राखी को ले के ये हुमायूँ वाली कहानी मैंने पहले भी सुनी है और धुन्दला याद है कि शायद पढ़ा भी है और किसी क्लास के टेक्स्टबुक में पढ़ा है। एक और कोर्स के की हीं किताब में रक्षा बंधन के बारे में एक और बात पढ़ी थी। देखिये पहले लोग ऐसा खुल के लिखते थे।

एक किताब आती थी व्याकरण भास्कर और निबंध भास्कर, उसमे किसी त्यौहार पे लेख की शुरआत इस तरह थी कि हिन्दुओं के चार प्रमुख वर्ण हैं और हरेक वर्ण का अपना त्यौहार है। ब्राह्मणो के लिए रक्षा बंधन है, क्षत्रियों के लिए दसहरा है, वैश्यों के लिए दीवाली है और शूद्रों का त्यौहार होली है।  बचपन में मुझे ये बात अच्छी नहीं लगी, ब्राह्मण था तो मुझे बड़ा अजीब लगा कि यार ये रक्षा बंधन टाइप का बेकार त्यौहार क्यों है हमलोगो का, अब सातवीं के किस बच्चे का फेवरेट फेस्टिवल राखी है !!! मेरा उस वक़्त दीवाली था।  मुझे पढ़ के अच्छा नहीं लगा।

बाद में थोड़ा ज्ञान हुआ तो पता चला कि ब्राह्मण लोग रक्षा बंधन बांधते थे। मुझे याद है पहले रैंडम ब्राह्मण पंडित लोग राखी के दिन घरों में आते थे और रक्षा बंधन बांधते थे और थोड़ा बहुत दक्षिणा (एक दो रूपया टाइप) लेते थे और ये घर घर घूम के ऐसा करते थे। अब बहुत दिनों से ऐसा कोई देखा नहीं है। बल्कि अब तो घर में साधू वाधु भी वैसे नहीं आते हैं जैसे पहले आ जाते थे कॉलोनी में, रैंडम्ली। अब कितने सच्चे होते थे वो साधू, वो और बात है, पर दिखते बिलकुल वैसे थे जैसे पुराने महाभारत रामायण के टीवी सीरियलो में साधू दिखते थे। अब देखा जाए तो घरों में भिखारी भी शायद हीं आते हैं।

अभी हाल हीं में पढ़ा, एक मज़ेदार डिबेट जो चल रहा है, वो ये है कि महारष्ट्र के लोगों को इतिहास में क्या पढ़ना चाहिए। ज्यादा मराठा को पढ़ना चाहिए या मुगलों को। उधर हीं फिर ऐसा भी पढ़ा की भाई अगर राणा प्रताप राजस्थान में हीरो नहीं होंगे तो कहाँ होंगे। मतलब अगर राजस्थान की इतिहास को राणा प्रताप को केंद्र में रख कर पढ़ा जाए न कि अकबर महान को। फिर केरल के लोग मुगलों के बारे में इतना क्यों पढ़े, जब उस तरफ उनका कोई डायरेक्ट हुकूमत या कहे तो कोई प्रभाव नहीं था। वो क्यों न अपने राजाओं या इतिहास पे ज्यादा गौर करें!!!

इस तरह से कहें तो झारखण्ड में भी मुग़ल बहुत लेट आएं थे और कभी पूरी तरह से आ भी नहीं पाए थे, तो हमलोग क्यों इतना ज्यादा चैप्टर मुग़ल को दे और क्यों न झारखण्ड के इतिहास को स्टेट टेक्स्ट बुक में ज्यादा महत्व दे।

इस तरह से फिर आखिर मुगलों का इतिहास फिर पढ़ाया कहाँ जाएगा।सिर्फ दिल्ली में। नहीं ?? ऐसा एक शेर भी था एक मुग़ल बादशाह के बारे में उसका फ़र्मान बस दिल्ली तक है।

अगर आप बोलियेगा उत्तर प्रदेश तो फिर या तो वो आगरे के ताजमहल में अटक जाएगा नहीं तो लखनऊ के cuisine में फँस के रह जाएगा, क्यों कि बिहार में अंदर आइएगा तो शेरशाह मिल जाएंगे, और पंजाब के तरफ ज्यादा भागियेगा तो दिल्ली के बाद सिख खड़े में मिल जाएंगे, रणजीत सिंह जी के साथ।

तो अभी जो ऊपर थ्योरी चल रही थी उस हिसाब से तो फिर मुगलों का दिल्ली के बाद पाकिस्तान हीं है। यह छोटी मोती त्रासदी नहीं है देश के मुसलमानो के ऊपर!!  इस हिसाब से क्या फिर गुजरात के लोग शिवा जी को विलेन के रूप में देखेंगे क्योंकि उन्होंने दो दो बार सूरत को लूटा था। या ऐसा हो कि सभी राज्यों को अपना अपना टेक्स्ट बुक बनाने दिया जाए और उसके ऊपर एक राष्ट्रीय टेक्स्ट बुक भी हो जिसमे इन सबों का एक बेहतरीन समागम हो।

क्या औरंगजेब हीरो हो सकता है और हिन्दुओं (जो भी इसका मतलब होता हो) के लिए भी हीरो हो सकता है। एक कहानी हाल हीं मैंने पढ़ी थी औरंगजेब को लेकर।  आपको सुनाता हूँ।

एक बार दारा शिकोह ने एक महल बनवाया और वहां अपने पिता शाहजहां और भाइयों को बुलाया।  औरंगजेब भी आया था। दारा शिकोह के अगुवाई में सभी लोग एक कमरे में आएं जहाँ बैठने की व्ययवस्था थी। औरंगजेब एक दम दरवाज़े के पास रखे हुए कुर्सी में समझो दरबान की तरह बैठ गया। बाकी लोग अंदर आकर अपने ऊंचे सिंहासनो में बैठे। दारा शिकोह ने औरगजेब की ये बात शाहजहां को दिखाई।  शाहजहां को औरंगजेब की यह हरकत अच्छी नहीं लगी।

उनको लगा कि औरगजेब ने शहजादे की मर्यादा का पालन नहीं किया है। और जो अपने इस खुदा की दी हुई इज्जत को आदर नहीं देता है वो खुदा की तौहीन करता है। आदमी को हमेशा अपने पोजीशन का ख़याल रखना चाहिए। थोड़ा एलिटिसिस्म टाइप की बात लग सकती है लेकिन अगर आप खुदा को मानाने वालों में से हैं तो शाहजहां की बात ठीक लगती है। खुदा ने आपको इज़्ज़त बक्शी है आप उसका शुक्रगुजार होइए और उसकी इज़्ज़त रखिये।

औरंगजेब ने उस समय शाहजहां को अपने हरकत पे कोई सफाई नहीं दी और कहा वो आने वाले समय में कभी अपना कारण बताएँगे।

शाहजहां ने सजे के तौर पे उसे कहीं और भेज दिया शायद गुजरात की तरफ और वहां उसने अच्छा परफॉर्म किया और बहुत बाद में शाहजहां को बताया कि उस दिन उसने देखा कि कमरे में एक हीं दरवाज़ा है तो वो सुरक्षा की नीयत से कि कहीं अगर दारा ने अगर शाहजहां को धोखेबाज़ी से क़ैद करना चाहा तो इस कारण, बादशाह की सुरक्षा की नीयत से वो वहां दरवाज़े के पास बैठा। कहना नहीं होगा कि शाहजहां खुश हुए।

दारा शिकोह के बारे में कहतें हैं की वो एलिटिस्ट टाइप था। और घमंडी था। किसी ने चिदम्बरम जी के बारे में बोला था कि उनके अंदर बहुत intellectual arrogance था। देखिये सब योग्य होते भी गोपाल गाँधी यहाँ हार गएँ। नेता लोग सही में वेंकैया नायडू को वोट किये हैं और, और ज्यादा करते, अगर पार्टी प्रेशर नहीं होता।

तो खैर पूरे ब्लॉग में नोटिस करने वाली बात पहली लाइन में हीं थी। रानी कर्णावती कौन थी!!! ध्यान से पढ़ा ?? राणा सांगा की विधवा। राणा सांगा अगर याद नहीं हो तो याद दिला दूँ बाबर के खिलाफ खानवां के युद्ध में खेत रहें थे, खानवा के बाद हीं कह सकते हैं बाबर ने हिंदुस्तान जीता था। हुमायूँ, बाबर का बेटा था। उनके बीच तो लगता नहीं है उतनी वितृष्णा थी एक दुसरे के प्रति, जितनी अभी यहाँ आ रही है।

लेकिन इसका मतलब फिर ये भी नहीं है की राजा मानसिंह भारत के हीरो हो जाएंगे। हीरो तो राणा प्रताप हीं रहेंगे। यकीन नहीं होता तो किसी भी राजपूत को बोल के देखिये कि आप राजा मानसिंह के जैसे महान हैं। 🙂

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