राष्ट्रपति चुनाव के बहाने 

​अगर किसी बात की चर्चा देश के चाय-पान दूकानो में हो रही है, तो इसका मतलब है कि अब वो बात देश में राजनीतिक बहस का एक मुद्दा है। बात राष्ट्रपति चुनाव की चल रही थी और जब मैं दुकान में आया तो एक छोटा सा ग्रुप वहां पहले से मौजूद था। एक बोल रहा था…

लायक आदमी तो इसके एक हीं थे …. 

मेरे कान खड़े हुए। कहीं कलाम साहब कब्र से बाहर तो नहीं आ गए। लेकिन नहीं, उनके कैंडिडेट थे, आडवाणी जी।।मैंने पुछा क्यों भाई… !!बोला वही बात …

उनकी किस्मत वो प्रधानंत्री नहीं बन पाये, राष्ट्रपति तो बनाना था। 

मैंने बोला …उनकी किस्मत खराब थी, तो क्या, ऐसे ख़राब किस्मत वाले को देश का राष्ट्रपति बना देना उचित होता। जब मैंने देखा कि मेरे इस घटिया जोक पे कोई नहीं हँस रहा है तो मैंने बोला…

लेकिन वो आडवाणी जी हीं थे ना, जो रथ ले के निकले थे, जिससे मस्ज़िद टूटा था।

इस पर दुकान वाला छूटते हीं बोला …

तो क्या गलत हुआ था, मस्ज़िद भी तो वहां मंदिर तोड़ कर हीं बनाये थे।

रांची थोडा बीजेपी टाइप टाउन है, खुलेआम।

मैंने फिर बोला …

लेकिन वो तो आज से दस हज़ार बीस हजार साल पूरानी बात है, अब उसका क्या…

वो पहले बोला..  इससे क्या … और एक साथ बहुत सारे लोग बोलने लगे। फिर वही बोला…

सुनिए वहां तोड़ के स्टेडियम बना दीजिये …

मैंने बोला क्यों कुछ तोडा जाए या जाता!!! वो तो बहुत पुरानी बात है जब टूटी थी।

तो एक बोला …  ठीक है आज हमलोग वही कर रहे हैं …

मैंने पूछा…

क्यों! क्यों वही काम करे। ये वहीं रहता तो लोगों को याद दिलाता रहता कि ऐसा हुआ था !कहीं न कहीं, कुछ न कुछ, कमी तो रही होगी न हमलोगों में, नहीं तो कैसे टूट गया। अपने आप तो नहीं टूट गया था ना। इसपर वो आदमी बोला और बड़ा अच्छा बोला,

बोला…

अपना अपना सोच हैं  ।।

इधर मैं सोंच रहा था बोलचाल की भाषा में (मतलब colloquial में ) सेकुलर और सिक्युलर दो टर्म है। आखिर उनमे क्या अंतर है।

मेरे ख़याल से एक अंतर होगा ये मानना कि मंदिर तोड़कर कर मस्ज़िद बनाये गए थे, पर वो बहुत पहले हुए थे और उसका मतलब ये नहीं है कि अब उन सब मस्ज़िद या किसी भी मस्ज़िद को अब तोड के बदला लें। अब नहीं कर सकते हैं। नहीं करना चाहिए !! क्यों !!

क्योंकि राज्य आपको ऐसा करने नहीं देगा।  क्योंकि हमारा राज्य सेकुलर है।

यह होगा सेकुलर।

सिक्युलर होगा ये कहना कि ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मंदिर तोडा गया था। राम जी सिर्फ एक काल्पनिक कहानी है अमर चित्र कथा के, जैसे सुपरमैन है मार्वल के। मतलब ऐसा नहीं है कि ये बाते गलत हैं या सच है, इस तरह से, इस तरह की बातों को मुद्दे में लाना एक बीमारी है।

आडवानी जी मेरे पहले राजनितिक हीरो थे। और बहुत दिनों तक रहें थे। मैंने हमेशा बीजेपी को आडवाणी जी की पार्टी समझी। खुल के बोलू तो मेरे हीरो बीजेपी में आडवाणी जी थे, न की अटल जी। हां यह भी जरूर बोलूंगा कि मैं वोट देता नहीं हूँ, लेकिन अगर देता, तो मनमोहन सिंह जी को देता, न क़ि उनको देता। वो चुनाव, आपको याद होगा, उन्होंने मनमोहन सिंह जी को देश का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री  कह कर लड़ा था।

हालाँकि आडवाणी जी वास्तव में बहुत सक्षम उम्मीदवार हैं। बल्कि बहुत हद तक, देश के राष्ट्रपति में जो सारे गुण चाहिए, जैसे राजनीती के क्षेत्र में वरिष्ठता वगैरह, सब हैं उनमे। मगर फिर एक और बात भी है।

आप देखे तो यह हिन्दू सांप्रदयिकता की राजनीति जो अभी हमारे देश में चल पड़ी है, उसमे, इनका बहुत बड़ा हाथ है। आधुनिक युग में इनको एक प्रकार से इसका जनक माना जा सकता है।

हो सकता है उन्होंने रथयात्रा और कार सेवा इस भावना के साथ ना निकाला हो, इस पर तो कोर्ट देख हीं रही है, लेकिन परिणाम क्या था उसका। मस्ज़िद टूटना। जिसका शायद अफ़सोश भी जताया हैं उन्होंने। मस्ज़िद टूटना (यहाँ कुछ लोग शहीद होना बोल के भी पढ़ते हैं) कोई बड़ी बात नहीं, मगर इसका जो जलवा उन्होंने क्रिएट किया था, वो थोडा ख़तरनाक है।

दूसरी एक और बात है जो मैंने बहुत जगह पढी है। वो मोदी जी को हटाने वाली बात। वहां भी कहीं पढ़ा है या सुना है कि आडवाणी जी ने कहा था मोदी जी के इस्तीफे के समय में कि इस्तीफा माँगा तो पार्टी में बवाल खड़ा हो जाएगा।

कभी कभी मैं सोंचता हूँ कि अगर उस समय वो राजधर्म वाले लोगों के तरफ खड़े हो जाते तो क्या सही में इतना बड़ा बवाल खड़ा हो जाता, कि पार्टी पॉवर में भी संभाल नहीं पाती। मैं कंधार पे अब और नहीं जाऊँगा।

एक और बात है उनकी वो जिन्ना वाली। सच बात है कि पढ़ा लिखा हरेक इंसान यह जानता है कि जिन्ना पर्सनल लाइफ में बिलकुल मज़हबी नहीं थे, वो पोर्क खाते थे, उनके नज़र में religion or caste or creed… has nothing to do with the business of the State and by the way इसके ठीक विपरीत थे नेहरू जी। उन्हें योगासन भी आता था और श्रद्धा के साथ साधुओं से भी मिलते थे, पर राजनीति उन्होंने कभी भी धर्म की नहीं की । भारत के secularism सेकुलरिज्म को बहुत लोग nehruvism नेहरुविज्म भी बोल सकते हैं।

मगर जिन्ना को सेकुलर बोलना सिक्युलर है। ठीक है वो पोर्क भी खाते थे, सावरकर साहेब भी बीफ खाते थे। और बहुत सारे और भी हिन्दू राष्ट्र वाले खाते हैं। मगर क्या कोई उन्हें सेकुलर बोलेगा। उन्हें तो सिक्युलर हीं बोलना होगा।

क्या उनके नाम पर आम सहमति बन जाती। अगर बन जाती तो विपक्ष ने क्यों नहीं खुद हीं पहले उनका नाम रखा। उनके नाम पर आम सहमति नहीं बनती।

लेकिन इसके बावज़ूद आडवाणी जी अभी भी मेरे लिए बहुत बड़े हीरो हैं। और सच्चे हीरो हैं। करन थापर जी उनको पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें अच्छा लगता है कि वो सॉरी बोल सकते हैं। मगर उनको मैं कुछ और बोलने के लिए भी याद रखूँगा और वो थी नयी अवाज़….  राम रोटी और इंसाफ !! ये होता है राजनीतिक नारा… सबका साथ सबका विकास तो साबुन का प्रचार है।

 

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