A Cricket Post

मैं भी चाहता हूँ आज पाकिस्तान जीते मगर इसीलिए ताकि वो इंडिया को फाइनल में हराये। इसलिए नहीं कि अगर चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में पाकिस्तान भारत को हराता है तो भारत का यह नया जवाँ राष्ट्रवाद थोड़ा संयम बख़्शेगा। मेरा कारण pure क्रिकेट है। क्योंकि नए लड़के जो भारत पाकिस्तान franchise के भोक्ता बन बैठें हैं, वो मौका वाले, वो पाकिस्तान को बड़ा हलके में ले रहें हैं। ये जो ये हलके में ले रहें है, वो भारत पाकिस्तान क्रिकेट के इतिहास को वो सम्मान नहीं दे रहें हैं।

आप यहाँ क्रिकेट को राजनीति से नहीं हटा सकते हैं। यहाँ राजनीति गली क्रिकेट से शुरू हो जाती है, किसको बैटिंग मिलेगा किसको नहीं!! मगर वहां भी क्रिकेट की इज़्ज़त है, मतलब जिसका बैट है वही बैटिंग करेगा ऐसा “टीम” में नहीं होता है, और टीम बनाने से हीं असली क्रिकेट खेलना शुरू होता है। बाकी तो घर में खेलने टाइप से हुआ। और ज्यादातर जो नए लड़के हैं वो असली में घर के आगे क्रिकेट नहीं खेले हैं। मतलब जैसे हमलोग खेलते थे, इधर बोलते थे बोरो (borrowed) प्लेयर ले के।

जब पाकिस्तान बन रहा था तो बूढ़ा लोग पाकिस्तान बनाने में नहीं था। ये सब लड़कवन लोग थे, अलीगढ वाले (AMU) जो आगे आगे थे। आधा गांव  राही मासूम राज़ा, वही जिन्होंने टीवी वाले असली महाभारत का डायलाग लिखा था, भ्राताश्री वाले, उन्होंने बड़ा अच्छा वर्णन किया है उस समय का इस उपन्यास में। यहाँ भी भारत पाकिस्तान मैच में ऐसा हीं एक लड़कवन वाला क्राउड है। मुझे लगता है इन्होने असली देखा नहीं है।

इंडिया टुडे में पढ़ा था या क्रिकेट सम्राट में याद नहीं, मगर पढ़ा था कि जावेद मियाँदाद वहां से आया था जहाँ क्रीज़ के सामने एक रुपया  रख के रन आउट कराते थे। लेकिन मियाँदाद बाकी जो हुए रन आउट बहुत कम हुए। उनका छक्का लोगों को लगे कि बहुत मतलब पुरानी बात है, मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बात क्या थी। अभी भी आंकड़ों  में पकिस्तांन आगे है क्योंकि बहुत हराया है, हालाँकि लड़कों ने भारत को ज्यादा जीतते देखा होगा।

मगर एक समय भारत पकिस्तान मैच मतलब पकिस्तान हराने के लिए उतरता था और तब भारत गावस्कर के साथ खेलता था, और भारत का हार तय हीं होता था, जीत जाते थे तो जश्न होता था।  तो ये आखिरी बॉल में छक्का वाला मैच वो मैच था जिसमे गावस्कर ने 92 बनाये थे, फिर भी पाकिस्तान जीत गया था, आखरी बॉल में छक्का लगा के, मतलब पकिस्तान आपको हरा हीं देगा। पढ़ा है कि उस छक्के के बाद मियांदाद साहिब रातों रात मालामाल हो गए थे।

गावस्कर महान थे निःसंदेह, उनके बारे में कहीं पढ़ा है कि उनकी बेस्ट इन्निंग्स या तो ड्रा कराने या हार से बचाने वाली थी। और वो कभी हेलमेट लगा के नहीं खेलें थे।

उसके बाद जो अगली क़रारी हार मिली थी वो थी 1992 में और फिर शारजाह में हीं। उस समय मतलब ऐसा हो गया कि लोग बोलने लगे कि शारजाह में पाकिस्तान को हराना इंडिया टीम के लिए असंभव है और उसके बाद और बहुत बार हारें शारजाह में। मुझे एक मैच और याद है जिसमे अतुल बेदादे खेला था। उसमे भी हारें हीं थे।

शायद इंडिया टुडे में पढ़ा था कि कैसे 1992 में जब उस समय पाकिस्तान के प्लेयर एक-एक रन के लिए पिच में एक दुसरे से लड़ रहें थे, तबं भी वो भारत से जीत गए थे शारजाह में, और बुरे तरीके से भारत को हराकर उन्होंने कप जीता था शारजाह में। और फिर बहुत दिनों के बाद भारत पाकिस्तान का कोई मैच खेला जा रहा था।  उस वक़्त लोग इस हद तक गिर गएँ कि बोलने लगे कि शारजाह में अंपायर बेईमान थे।

मतलब आकिब जावेद ने हैट्रिक लिया था और वो भी एलबीडबल्यू में। मुझे याद है इमरान ने कहा था कि आप वो तीनो एलबीडबल्यू किसी भी अंपायर को दिखा लीजिये। आप देखिये यहाँ….

वैसे तेंदुलकर ने हैट्रिक विकेट दिया था ध्यान दिए ??

वहां एक टैक्सी ड्राइवर बोला उस लेखक को कि यार नहीं हरा सकते हो तो आते क्यों हो !!!आप मान लो नहीं हरा सकते हो उनको !!

जो बोलते थे न पाकिस्तान से डर क्रिकेट में, वो उस फेज का पीक था। पाकिस्तान को शारजाह में हराना एक मतलब राष्ट्रीय सम्मान का मुद्दा बन गया था। इमरान खान यहाँ तक बोल दिए थे कि कश्मीर का मुद्दा क्रिकेट से सुलटा लो।

मगर फिर तुरंत मिली इंडिया पाकिस्तान की टीम 1992 वाले वर्ल्ड कप में, ऑस्ट्रेलिया में। उस वर्ल्ड कप से पहले शारजाह में पिटने के बाद, Benson & Hedges सीरीज में भारत का क्या हाल हुआ था, सबको पता होगा। और ये हारी हुई टीम अब वर्ल्ड कप में पाकिस्तान से खेल रही थी।

एक बात और याद आयी उस एलबीडबल्यू वाले शारजाह में इंडियन टीम को सब टैक्सी वाले लोकल लोग बोलते थे कुछ भी हो बस पाकिस्तान से मत हारना। और हार गए थे, आकिब जावेद एलबीडबल्यू में हैट्रिक ले गया!!!

इस बार लोगों को उम्मीद तो वैसे भी नहीं हीं थी, इच्छा जरूर थी।

होली का टाइम था, पर इतना पटाखा फूटा, बीबीसी बोला लगा दीवाली है। मौका का पटाखा वहीँ से है। उस मैच से भी मियांदाद भारत में अमर हो गए हैं।

और तेंदुलकर मैन ऑफ the मैच थे, हाफ सेंचुरी के साथ, ऑस्ट्रेलिया के पिच में पाकिस्तान के उस अटैक के सामने!!

फिर उसके बाद वेंकटेश प्रसाद वाले क्वाटर फाइनल में, उसमे याद कीजिये भारत हार हीं रहा था मतलब बहुत जबरदस्त धुलाई हो रही थी मगर पाकिस्तान वाले ज्यादा जोश में आ गएँ , जीत हीं जाएंगे …सोच रहें होंगे। अगला वहीँ पे मारूंगा, टाइप देख लो!! आखिरी बाल में छक्का लगा के जीतूंगा टाइप से। मगर मगर …शायद वहीँ से कहानी बदल गया।

मियांदाद शायद वही से रिटायर हुए होंगे। बहुत देर तक टीकेँ रहें योद्धा की तरह उस मैच में भी, मगर हारे, बैट घसीटते हुए बाहर गएँ। उसके बाद शारजाह गया भाड़ में, हमने उनको कनाडा में हराया सहारा कप में।

और उसके बाद से कहानी बदल हीं गयी। खैर अब आज तो पाकिस्तान जीत हीं गया।

शायद मज़ेदार बात होगा यह जानना कि सरफ़राज़ जो पाकिस्तान के कप्तान हैं, उनके अपने मामू इटावा उप के हैं। मतलब यहीं के लड़के हैं उधर भी। तो भाई थोड़ा सम्मान दो उनको, ऐसे भी ट्रीट मत करो आज चीयर कर कर के जैसे बकरे को बलि से पहले पूजते हों।

और लोग पूरा भूल रहें हैं कि बीच में बांग्लादेश भी है। और उनका शुरू से यही प्रॉब्लम रहा है btw

लेकिन फिर भी मुझे बांग्लादेश से डर है तो आगे कल के बाद….

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