आप मत पढ़िए 

आराम से बैठकर किसी विषयवस्तु के ऊपर लिखे कितने दिन हो गए। लिखने की तुलना शायद प्लेटो ने हस्तमैथुन से की है। उनका कहना है कि हम लिखते तभी हैं जब हम उस बात को बोल नहीं सकते हैं। मतलब बोलना सेक्स है और लिखना उसका विकल्प। 

आखिर इसके पीछे का तर्क क्या है। एक तर्क तो यह है कि हम बोल कर अपनी बात को सिमित लोगों तक हीं पंहुचा सकते हैं। बोलने की एक अवधी होती है, उस अवधी के बाद भाषण खत्म हो जाता है। मगर अगर आप किसी बात को लिख देते हैं तो वो बहुत देर तक, बहुत दूर तक जा सकती है। 

एक और बात भी है कि आप जब लिखते हैं खासकर तब जब आप सोच समझ कर लिखते हैं तो वहां आप बहुत गभीरता से अपनी बात रख सकते हैं। बोलने में शायद यह संभव नहीं हो। दूसरी एक और बात है कि भाषण को वक्ता के हाथ से छीना नहीं जा सकता है। जैसे कि बोलते वक़्त हम कमोबेश सुनने वालों को काबू में रखते हैं, अपने बात का मतलब समझा सकते हैं अगर ऐसा लगे कि सुनने वाला समझ नहीं रहा है तो। 

लिखने में जो पढ़ने वाला है, पाठक वो श्रोता की अपेक्षा ज्यादा आज़ाद होता है। पाठक अपने मन से भी लेख का मतलब निकाल सकता है। दूसरी बात अक्सरहां पाठक के सामने लेखक बैठा नहीं होता है उसको असली मतलब समझाने के लिए। 

अब एक बात बताइये कि फ़िल्म एक लेख है या भाषण। 

फेसबुक या व्हाट्सएप्प चैट लेख है या बातचीत। 

हम अपनी ज़िन्दगी में ज्यादा प्रभावित किससे होते हैं। जो हम पढ़ते हैं उससे या जो हम सुनते हैं उससे। लेकिन क्या बिना सुने हम पढ़ सकते हैं। यह थोड़ी गंभीर बात है। सन्दर्भ समझाता हूँ। 

साल या शायद दो साल हो गए, एक नॉवेल पढ़ा था एक बांग्लादेशी लेखक का, ज़िया उर रहमान साहिब। कोई उतना भी मस्त नॉवेल नहीं है लेकिन वो genere जिनको पसंद है, NRI सेटिंग वाला, The Reluctant Fundamentalist type वाला उन्हें अच्छा लगे। नाम था In The Light of What we Know. 

उसमे दो लड़के थे। एक पाकिस्तानी था जिसके father ऑक्सफ़ोर्ड में शिक्षक थे, ग्रांडफादर अम्बेसडर थे उस टाइप वाला और दूसरा बंगलादेश के 71 वॉर के रिफ्यूजी का बेटा था या ऐसा हीं कुछ। दोनों ऑक्सफ़ोर्ड में हीं पढ़ते थे। उसमे से जो अम्बेसडर वाला लड़का था उसने एक बड़ी मज़ेदार बात बोली थी कि उसने नोटिस किया था कि रिफ्यूजी वाला लड़का बहुत सारे mathematicians ya फिलोफेर्स के नाम बड़े अजीब तरीके से बोलता था क्योंकि उसने उन नामों और कामों को सिर्फ पढ़ा था ना कि सुना था।

आप में से कुछ लोग इस बात को एक झटके में समझ गए होंगे कि ऐसा कैसे हुआ। अगर आप नहीं समझे तो किसी भी अंग्रेजी पढ़े हुए, अंग्रेज़ी में बड़े हुए को नहीं दोनों में अंतर है, और यह अंतर हीं इस बात का मूल है, तो आप किसी अंग्रेजी पढ़े हुए को जो नहीं जानता है Foucalut कौन है है, उसको बोलिये Foucault पढ़ने के लिए। 

तो अब बताइये क्या बिना सुने हुए कोई पढ़ सकता है। 

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