बस ऐसे हीं लिख दिया 

कभी कभी मुझे लगता है कि मेरे पास इतना काम है कि मुझे एक मिनट की भी फुर्सत नहीं होनी चाहिए। फिर उन कामों को देखता हूँ तो लगता नहीं कोई काम उनमे से ऐसा भी है जिसके कारण दुनिया रुक जाए। अगर मैं वो सारे काम न करूँ जो मुझे करना चाहिए तो कुछ नहीं होगा, कोई दूसरा उसे कर देगा। और कोई दूसरा न भी करे तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। 

इस तरह से सोचने लगे तो फिर तो किसी को भी कोई भी काम न करे तो क्या फर्क पड़ेगा। कोई न कोई दूसरा उस काम को कर देगा। और कोई दूसरा भी न करे तो… लेकिन यह बात सारे कामों के बारे में ऐसा नहीं बोला जा सकता है। किसी डॉक्टर को कोई ऑपरेशन करना होगा, अगर वो ना करे तो फर्क पड़ेगा। कहीं किसी शहर में लोड शेडिंग के कारण लाइन कटी होगी। किसी का काम होगा टाइम होने पे लाइन दे दे, नहीं देगा तो निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा। 

मुझे कल क्लास लेना है। नहीं लूँगा तो क्या होगा। कोई और ले लेगा। और कोई नहीं भी लिया तो भी क्या फर्क पड़ने वाला है। लेकिन वैसे कल कोई क्लास नहीं लेना है, कॉपी चेक करने हैं, वो भी अगर कल नहीं भी करूँ तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

मुझे याद है शायद ग्रेजुएशन के समय एक किताब पढी थी।How to stop worrying and Start Living, डेल कार्नेगी साहिब की मजेदार किताब है। बहुत सी मज़ेदार बातें लिखी हैं उस किताब में मगर जो मुझे अभी भी याद है वो है कि हम 80 प्रतिशत चिंता अपनी ज़िन्दगी में उन बातों के लिए करते हैं जो हमारी ज़िन्दगी में कभी होती हीं नहीं।पलट के देखूं तो ये बात सच है। मुझे याद है कितनी बार मैंने अपना समय किसी ऐसे बात की चिंता में बिता दी है जो कभी मेरे साथ हुई हीं नहीं।

वैसे अभी मैंने इस ज्ञान को देने के इरादे से डेल कार्नेगी की बात नहीं की। मुझे याद है जिस तरह से उस किताब की शुरुआत हुई थी। उसमे लेखक अपने ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था कि कॉलेज के ज़माने में वो सोचता था कि वो ये करेगा वो करेगा, ऐसी किताबे लिखेगा, स्पेसिफिक जो याद है वो है किताब लिखना, मगर असल ज़िन्दगी में वो वैसा कुछ भी नहीं कर रहा होता है। फिर कैसे वो एकदिन हिम्मत करता है और अपने डे जॉब को छोड़ता है, फिर वो एक नाईट स्कूल में पढ़ाता है, और धीरे धीरे वो सारे काम करता है जो वो करना चाहता था, इन्क्लूडिंग राइटिंग बुक्स। 

उसकी इस किताब (How to Stop worrying….) से पहले एक और किताब छप चूकी थी। वो भी बेस्टसेलर थी। How to Win Friends and Influence People….वैसे किताबे लिखना और न सिर्फ लिखना बल्कि एक सफल लेखक बनना बहुत लोगों का सपना होता है। आखिर सभी लोग चेतन भगत से इतना क्यों चिढ़ते हैं। वो बन गया। जैसे सलमान रुश्दी का कही पढ़ा था कि सारे कॉपीराइटर यही सोचते हैं, रुश्दी ने वो कर दिया with The Midnight’s Children. 

मेरी माँ बोलती है कि मेरे लेखों में कहीं न कहीं पठनीयता की कमी है। मुझे भी लगता है कि यह बात सही है। दरअसल मेरे अंदर एडिटिंग के लिए patience नहीं है। ऐसा नहीं है बिलकुल हीं एडिट नहीं करता हूँ। करता हूँ मगर एडिटिंग के लिए व्याकरण में पकड़ चाहिए, सिर्फ हिज्जे ठीक करना तो एडिटिंग नहीं है न। 

गांधी जी अपनी किताब स्टेनो को dictate करते थे। सलीम जावेद के इंटरव्यू में सुना कि उनके भी राइटर आते थे, मुंशी जी टाइप। मतलब किसी ने पुछा उनलोगों से कि बड़ी चर्चा थी इस बात की आख़िर दोनों में लिखता कौन था। इसपे सलीम ने बताया था, दोनों हीं नहीं लिखते थे, एक वो आते थे टाइपराइटर के साथ….

तो ये भी एक बात है, नहीं!! एक स्टेनो हो, तो भी लिखने का मज़ा आ सकता है। अब इसमें यहाँ कल्पना बहुत आगे तक जा सकती है। मुझे बहुत लोगों ने बोला, आप बोलिये हम लिखते हैं। लेकिन फिर मूड नहीं बना। वैसे एक बात है लेखक बनने में और सफल लेखक बनने का मज़ा कुछ और हीं होता होगा। जैसे मैं टीचर हूँ, तो बहुत सारे टीचर लिखते हैं। बल्कि लिखना तो एक प्रकार से उनका एक दायित्व है। मगर वो हार्वर्ड लॉ रिव्यु टाइप के लिखने को मैं मज़ा वाला लिखना नहीं बोलूंगा, वैसे मैं वहां लिखना चाहूँगा वो और बात है, मगर अगर उस तरह के सीरियस राइटिंग की भी बात हो तो भी मैं उस तरह से लिखना चाहूँगा जैसा foucault ने बोला है फ़ोटो में । 

मगर असली


 लिखना है, कल्पना वाला लिखना। उपन्यास या कहानी। मगर राजा है यहाँ पे कविता लिखने वाला, चाहे शायरी हो या verses हो या फ़िल्म का गाना हो। मुझे लगता है कविता आप बिना उसके हाथ के नहीं लिख सकते हैं। 

लिख सकते हैं, लिखने के लिए तो मैं भी लिखता हूँ, मगर पसंद आ जाए, जुबाँ पे चढ़ जाए, उसके लिए सर पे उसका हाथ होना चाहिए। सच पूछों तो किसी भी तरह की मौशिकी बिना नीली छतरी वाले के दया दृष्टि के नही हो सकती। मगर फिर देखिये संगीत से उन तक पंहुचने की बात भी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मौशिकि हीं वो अकेली चीज़ है दुनिया में जिसपे उसका भी अख्तियार नहीं है। 

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