बाहुबली के बहाने

समझ में नहीं आ रहा है कुमारवर्मा ?? यज्ञ हो रहा है !! बाहुबली के मृत्युकाण्ड को शिवगामी के हाथों से लिखवाने का महायज्ञ !! तुम तो एक छोटी सी आहुति हो।

बाहुबली का बेस्ट सीन है मेरे हिसाब से।

वाह!!!! याद नहीं यज्ञ शब्द का इतना जीवित उपयोग कभी सुना या पढ़ा हो कहीं गीता के अलावा।। एक बेहतरीन उदाहरण यज्ञ शब्द का अभी जो गीता से याद आ रहा है वो है वो वाला verse जहाँ श्री कृष्ण कहतें है…..

और शूद्रों के लिए मंत्रहीन यज्ञ का विधान है।

महाभारत या उस तरह पौराणिक काल पे रचयिता की जो पकड़ है वो लाजवाब कर देती है। हालाँकि कुछ और भी हैं यहाँ लिखने को पर आज लिखूंगा बाहुबली के डायलाग पे। भारतीय सिनेमा में डायलाग का अपना स्थान है।

पार्ट वन के एक रिव्यु में कहीं पढ़ा था कही पे कि उर्दू शब्दों इधर उधर इतना उपयोग थोड़ा आश्चर्य करने वाला है !!उस रिव्यु में उन्होंने पार्ट वन का एक सीन उद्धृत किया था…..

“सारी लाशों को दफना दो…” वाले डायलाग को।

यह भी पढ़ा था कहीं पे कि कालकेय के रूप में आदिवासियों का बड़ा प्रोटोटाइप प्रस्तुत किया गया है।

अब यह सिनेमा अचानक से हिन्दुत्व की ब्रांड अम्बेस्डर बन गयी है।

अगर लोगो को याद हो तो फेसबुक में एक पोस्ट चला था, तुरंत जब बाहुबली रिलीज़ हुई थी तब। उसमे किसी ने शिवलिंग को कंधे में उठाने और PK मूवी के शिव जी दौड़ाने वाले सीन को एक साथ रख कर पुछा था कि आखिर हिन्दू धर्म का यह तिरस्कार कब तक चलेगा। खैर अभी उधर नहीं जाता हूँ …

तो उर्दू का जो सबसे बेहतर इस्तेमाल मुझे लगा वो उस दरबार वाले सीन में है जब बाहुबली वन देवसेना को लेके पहली बार महिष्मती के दरबार में आता है और जहाँ पे बाहुबली को शिवगामी देवसेना और सिंहासन में से एक को चुनेने के लिए बोलती है और बाहुबली देवसेना को चुनता है, याद है डायलाग क्या मारा था बाहुबली ने तब,

सिंहासन के लिए मैं अपना वचन तोड़ दूँ यह आपकी दी हुई “परवरिश” का अपमान होगा ….

अब यहाँ पे एक बात बताइये कि अगर शुद्ध हिंदी में बोलना होता तो क्या होता डायलाग !!! परवरिश की जगह क्या बोलते। आपके दिए हुए “संस्कार” का अपमान होता। मगर संस्कार और परवरिश दोनों शब्दों के माने में थोड़ा अंतर है।

संस्कार भले माता पिता से मिलते हों मगर वो माता पिता के द्वारा कृत नहीं होते, इस डायलाग में फिर वो बात नहीं रहती जो बोली जा रही थी। यहाँ आप ध्यान दे तो बाहुबली शपथ भी शिवगामी को साक्षी मान के लेता है, न कि धर्म के नाम पे।

क्या परवरिश शब्द के लिए हिंदी में कोई शब्द है। अभी तो मुझे लालन पालन हीं याद आ रहा है। वैसे फिर लालन पालन में भी वो बात नहीं रहती। ध्यान दे तो यहाँ पालने का मतलब कुत्ता माना गया है, वैसे कुत्तों का बड़ा तिरस्कार किया गया है मूवी में या शायद तारीफ। यहाँ पे भी एक de tour ले सकता हूँ पर ये वाला कभी बात में। अभी यहाँ पे सिर्फ टॉमी और कट्टपा बोल के छोड़ देता हूँ।

एक और बात याद आ रही है। पाकिस्तानी ब्लॉग था शायद , जहाँ पे यह चिंता व्यक्त की जा रही थी कि किस तरह से पकिस्तान में बॉलीवुड के कारण हिंदी शब्द उर्दू लफ़्ज़ों को निगलते जा रहें हैं, जैसे अब लोग सपना बोलते हैं ख़्वाब की जगह। सुना है पाकिस्तान ने डोरीमोन को इसी चिंता में बैन कर दिया है।

अब यहाँ पे मुझे याद आती है अपने ज़िन्दगी में घटित एक घटना। बारहंवी की बात होगी। एक दोस्त थी मेरी। जिसने एक दिन मुझसे कहा “तुम इतना शुद्ध हिंदी क्यों बोलते हो… ”

मेरी ज़िन्दगी में शायद पहली और आख़िरी बार किसी ने कहा होगा कि मैं शुद्ध भाषा क्यों बोल रहा हूँ, मेरी व्याकरणिक त्रुटियां तो मेरी छोटी सी दुनिया में मेरे सारे दोस्तों और दुश्मनो को अच्छी तरह से पता है, चाहे वो मेरे अंग्रेज़ीदां दोस्त हों या दिल्लीवाले हिन्दीभाषी मित्र। तो मेरी उस मित्र ने जब मुझसे यह कहा… तब मैंने उससे पुछा….

मैं ऐसा क्या बोलता हूँ….

उसने कहा…. आवश्यकता कौन बोलता है??

मैंने पुछा….

तुम क्या बोलती?? वो बोली….

जरूरत !!!!

अब इस दरबार वाले सीन से एक और बात याद आयी।

यह मैंने सुना है और अपनी माँ से सुना है। उन्होंने शायद अपने स्कूल में सुना था कि अँगरेज़ राम जी का इंटरेस्टिंग मज़ाक बनाते थे, अगर आपको याद हो या आपने देखा होगा The King’s Speech फिल्म तो आपको पता होगा कि Edward VIII अपनी गद्दी छोड़ देते हैं अपने प्रेमिका से विवाह करने के लिए। वह 1936 ईश्वी की बात है।

सोचिये कि अंग्रेज़ों ने जो संस्कारी हिन्दुस्तानी बनाये थे उनके सामने ये कितनी बड़ी नैतिक मुसीबत हो गयी होगी कि कैसे अपने राजा के इस करतब को जस्टिफाई करे। तो वो कहते थे….

देखो एक तुम्हारे राजा राम थे जिन्होंने गद्दी के लिए सीता को छोड़ दिया और एक हमारे राजा एडवर्ड हैं जिन्होंने प्रेम के लिए गद्दी छोड़ दी….

किरण देसाई के The Inheritance of Loss में धुँदला सा कुछ याद आता है पढ़ते हुए कि एंग्लो इंडियन या शायद इसी तरह के महिलाओं का एक ग्रुप इस तरह से बात करता है कि इंडियंस को प्यार या love किसे कहते हैं नहीं पता होता है।

तो अब एक और सवाल उठता है इस सिनेमा से कि बाहुबली ने जो किया, क्या वो धर्म के अनुसार सही था। क्या एक होने वाले राजा को अगर अपनी पत्नी या राज्य के गौरव में से एक को चुनना पड़े, तो वो क्या चुने।

महाभारत से बाहुबली मूवी बहुत प्रेरित है इसमें कोई शक नहीं।

सबसे मज़ेदार समानता जो मुझे (चरित्रों के अलावा) लगी वो कहानी की व्यापकता में है। यह कहानी अनेक पड़ाव से गुजरती है, अनेक काल पे चलती है, और छोटे से जीवन में हीं बहुत कुछ घटित हो जाता है, जैसे देखिये सबसे पहले सिनेमा में दिखता है वो कबीला जहाँ शिवा बड़ा होता है, फिर विद्रोहियों की एक अलग कहानी है, फिर महिष्मती में कालकेय के साथ युद्ध, फिर कुंतल देश की कहानी, और फिर महिष्मती में वापस। इतने अलग अलग थिएटरों के बावजूद कहानी भटकती नहीं है।

क्या मेरे पोस्ट में भी बहुत भटकाव नहीं है, मगर उसके बावजूद क्या वो किसी एक जगह पे आके मिलते हैं। वैसे बाहुबली पे मेरा यह पहला पोस्ट है आगे और भी लिखूंगा। एक बात जिसपे मैं सोचता हूँ वो है शिव जी का स्थान इस कहानी में।

बाहुबली को युद्धस्थल में देख कर मुझे एक लाइन याद आती है जो अक्सर हीं पढ़ा है

“देख कर ऐसा लगता हो मानो साक्षात् शिव जी हीं युद्धस्थल में आ गए हों …

रूद्र सा। रूद्र वेद में भी वर्णित है मगर अब आगे फिर कभी….

क्रमशः

पुनश्चः 

राही मासूम रज़ा ने बड़ी शुद्ध हिंदी में टीवी वाले महाभारत के डायलाग लिखे थे। लेकिन उन्होंने एक Freudian टाइप बात कर दी थी। याद है मामा “श्री” भ्राता “श्री” ; सुना है मामूजान, भाईजान। यह जान हीं तो कहीं श्री नहीं बन गए थे। क्या परवरिश शब्द को ऐसे हीं देखा जाए….

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2 thoughts on “बाहुबली के बहाने

  1. thank you thank you… aur truti … yahan galti shabd sahi hoga, shighra heen sudharunga .. truti thoda procedural type word hai galti jyada substantive hai … 🙂

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