Geeta Chapter 2 verse 46

GEETA

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।2.46।।

यह गीता के दुसरे अध्याय का ४६ वा श्लोक है. इसके बाद जो श्लोक आता है उस श्लोक को सभी लोग या जो भी गीता को थोड़ा बहुत भी जानते है, उन सबों ने सुना है, वो है……

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

इस श्लोक के भी बहुत मतलब हो सकते हैं मगर मैं अपने यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके पर आता हूँ…

इसके मतलब में, मतलब इसके शाब्दिक मतलब में तो ज्यादा विवाद नहीं है, इसका शाब्दिक मतलब होगा… यावानर्थ मतलब जैसा अर्थ, उदपाने मतलब कुआं, एक छोटा जलाशय, का होगा जब सर्वतः संप्लुतोदके, मतलब जब सर्वतः मतलब हर जगह सम्प्लुतोदके मतलब पानी से भरा हुआ literally flooded with water, है.

तो शब्दशः मेरे ख्याल से इसका मतलब हुआ जैसा अर्थ, अब अर्थ के वैसे बहुत मतलब हो सकते हैं, एक अर्थ हुआ मतलब तो जैसा मतलब एक छोटे से कुएं का होता है उस जगह में जहाँ चारो तरफ पानी हीं पानी हो, अब यहीं पे मैं छोड़ देता हूँ और अगले वाले लाइन के भी शब्दशः मतलब पे आता हूँ,

मैंने कहा था कि पहले वाले के शब्दसः मीनिंग में थोड़ा एग्रीमेंट हैं, आप अगर पहले वाले पे हीं अटक गए हैं तो और बात है नहीं तो आगे बढे.

तावान्  यावान सहसंबंधी शब्द हैं जैसे जितना उतना, तो वैसे हीं उतना ही जब सर्वेषु मतलब सबो में, वेदेषु मतलब  वेदों में, मतलब, उसी तरह सारे के सारे वेदों में, तावान्सर्वेषु वेदेषु, मैंने बोला था कि दूसरे वाले का शब्दशः मुश्किल है,  ब्राह्मणस्य मतलब ब्राह्मणं का, के, की, याद है अगर आपने कभी संस्कृत पढ़ा होगा तो बालकस्य; बालकः बालको बालकः, तो ब्राह्मणस्य मतलब हुआ ब्राह्मण का, ya के ya की ya को, विजानतः मतलब जानना, विज्ञानं शब्द यही से आया है, विज्ञ का मतलब होता है जानने वाला, तो अब इस पुरे श्लोक का क्या मतलब हुआ. कुछ पॉपुलर ट्रांसलेशन पहले मैं रखूँगा।

पहला source https://www.gitasupersite.iitk.ac.in/srimad?htrskd=1&httyn=1&htshg=1&scsh=1&choose=1&&language=dv&field_chapter_value=2&field_nsutra_value=46

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे जलाशयमें मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता वेदों और शास्त्रोंको तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

सब ओर से परिपूर्ण जलराशि के होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है? आत्मज्ञानी ब्राह्मण का सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।।

यहाँ इसी साइट में शकराचार्य जी ने भी जो इस श्लोक पे लिखा था वो भी उपलब्ध है. पूरा का पूरा एक दम बॉडी पे देना ठीक नहीं है मैं फुटनोट में दे देता हूँ [1]

तो शंकराचार्य जी सन्यास मार्ग वाले थे यह झलक तो उनके मतलब में साफ़ दिखता है. उनके अर्थ के मूल को लेते हुए मैं बोलता हूँ कि पूरे श्लोक का मतलब हुआ जैसे एक छोटे से जलासय का उपयोग है, तब भी जब हर जगह पानी हीं पानी हों, या कहें तो जैसे एक छोटा से कुएं का अर्थ है तब भी जब सर्वतः संप्लुतोदके मतलब तब भी जब चारों तरफ पानी हीं पानी हो, हम जानते हैं वातावरण या हमारे शरीर का एक बड़ा हिस्सा या शायद 80 % वाटर हीं हैं, मतलब जैसे एक छोटे से जलासय से हीं हमारा मतलब सिद्ध हो जाता है, भले हीं सब जगह पानी हीं पानी हो, या हम अपने पानी के सारे जरूरत को एक छोटे जलासय से प्राप्त कर सकते हैं. उसी तरह सारे के सारे वेदों का ज्ञान ब्राह्मण को जान कर भी पा सकते हैं.

शकराचार्य जी ने पहले वाले का मतलब मेरे मतलब से उल्टा लगाया है, हालाँकि शब्दशः में हम दोनों एक हैं, उनका कहना है और बाकी ऊपर वालों ने भी पहले श्लोक का मतलब करीब करीब वैसा हीं लगाया है, कि जो प्रयोजन एक छोटे से जलासय का रह जाता है जब चारो तरफ जल हीं जल से भरे जलासय हो, मेरा कहना है बहुत प्रयोजन रह जाता है, उनलोगों का कहना है कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है, मैं कहता हूँ बहुत प्रयोजन रह जाता है, यावानर्थ, जो अर्थ, मैं कहता हूँ बहुत अर्थ, बल्कि मैं इसे ऐसे पढता हूँ, जैसे सारे बड़े जलसायों के मतलब एक छोटे से कुँए से निकल जाता है, वास्तवकिता यही है, भले हीं चारो तरफ जल हीं जल हो, हमारा मतलब एक छोटे से कुँए से निकल जाता है.

अब अगर अगली लाइन पर आएं तो दो शब्द  विवादस्पद हैं, पहला ब्राह्मण और दूसरा वेद या आप जिसको भी पहले रखें. दुसरे लाइन का एक मतलब जो मैं बोलता हूँ हुआ कि उसी तरह से सारे के सारे वेदों का अर्थ एक ब्राह्मण को जानने से मिल जाता है. वेद का मतलब होता है ज्ञान, विद्वान शब्द वहीँ से आया है, सर्वेषु वेदेषु का मतलब हुआ सभी ज्ञान को एक ब्राह्मण में जाना जा सकता है. शंकराचार्य ने कहाः है परम ब्रह्म को जानने से हो जाता है, मैं कहता हूँ किसी भी ब्राह्मण को जानने से हो जाता है.

ब्राह्मण कौन है? महाभारत में भीष्म ने ब्राह्मणों के लिए कहा है कि इन्द्रियों का दमन और स्वाध्याय ब्राह्मणों के दो प्रमुख धर्म है, उनको उनके सारे कर्मों का फल सिर्फ स्वाध्याय से मिल जाता है. उसमे दया की भी प्रधानता होती है, वो यज्ञ करवाता है, करता नहीं है,  मतलब आज कल के हिसाब से प्रोफेसर, मतलब वैसे लोग जो नॉलेज क्रिएट करते हों, या जो नॉलेज स्टोर करते हों, शास्त्रों में ब्राह्मण को ब्रह्मा के माथे, सिर से आया हुआ माना गया है, हमारे शरीर में जो सिर का रोल है, अगर पूरे समाज को एक शरीर माना जाए तो उस समाज में सिर या दिमाग का जो काम करेगा, वो ब्राह्मण है.

इस हिसाब से देखें तो सही बात है, किसी भी क्षेत्र में उसके ब्राह्मण को जान लेने से उस क्षेत्र के सारे ज्ञान विज्ञान का काम लिया जा सकता है, जैसे चारों तरफ जल हीं जल हो फिर भी एक छोटे से जलासय से उसका काम निकल सकता है.

मेरा वाला मतलब ज्यादा सही है. ऐसा मुझे लगता है. गीता एक गीत है, और गाने में पूर्ण मतलब नहीं लिखा जाता है, हाँ आपको मतलब की एक तस्वीर उभर कर आती है. मैंने एक तस्वीर उभारने की कोशिश की है.

ब्राह्मण शब्द का अब हिंदुस्तान में एक अलग हीं मतलब हो गया hai, जाति। ब्राह्मण अब एक एक जाति बन गयी है, जाति  संस्कृत के जन्म शब्द से आता है,  उससे जोड़ दिया गया है, और बस जोड़ दिया गया है, ब्राह्मण एक वर्ण होता है उसको तो लोग भूल हीं गए हैं, वर्ण वरन से आता है, चरित्र characteristics या कहे तो रंग भी होता है. अब जन्म का इसपे कितना प्रभाव होता है यह तो अलग बात है.

जैसे वेद शब्द को लीजिये. इसका शाब्दिक मतलब है ज्ञान, वैसे महाभारत में कहा जाता है वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया, मैंने सुना है वेदों के सात अंग और उपंग है, मतलब साफ़ है कि वेदों का ज्ञान एक सिस्टेमेटिक स्टडी थी. इस हिसाब से सर्वेषु वेदेषु का क्या मतलब हुआ. चारो तरफ ज्ञान का एक सिस्टेमेटिक तंत्र है, उसको एक ब्राह्मण के अंदर देखा जा सकता है. तभी वेदों में ब्राह्मण का इतना महत्व बताया गया है.

[1] सम्पूर्ण वेदोक्त कर्मोंके जो अनन्त फल हैं उन फलोंको यदि कोई न चाहता हो तो वह उन कर्मोंका अनुष्ठान ईश्वरके लिये क्यों करे इसपर कहते हैं सुन

जैसे जगत्में कूप तालाब आदि अनेक छोटेछोटे जलाशयोंमें जितना स्नानपान आदि प्रयोजन सिद्ध होता है वह सब प्रयोजन सब ओरसे परिपूर्ण महान् जलाशयमें उतने ही परिमाणमें ( अनायास ) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उनका अन्तर्भाव है।
इसी तरह सम्पूर्ण वेदोंमें यानी वेदोक्त कर्मोंसे जो प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् जो कुछ उन कर्मोंका फल मिलता है वह समस्त प्रयोजन परमार्थतत्त्वको जाननेवाले ब्राह्मणका यानी संन्यासीका जो सब ओरसे परिपूर्ण महान् जलाशयस्थानीय विज्ञान आनन्दरूप फल है उसमें उतने ही परिमाणमें ( अनायास ) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उसका अन्तर्भाव है।
श्रुतिमें भी कहा है कि जिसको वह ( रैक्व ) जानता है उस ( परब्रह्म ) को जो भी कोई जानता है वह उन सबके फलको पा जाता है कि जो कुछ प्रजा अच्छा कार्य करती है। आगे गीतामें भी कहेंगे कि सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं। इत्यादि।
सुतरां यद्यपि कूप तालाब आदि छोटे जलाशयोंकी भाँति कर्म अल्प फल देनेवाले हैं तो भी ज्ञाननिष्ठाका अधिकार मिलनेसे पहलेपहले कर्माधिकारीको कर्म करना चाहिये।

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