नहीं चाहिए जवाब 

अभी चुनाव के बाद हो रहे सारे विश्लेषणों में अथवा जितना मैंने देखा और सुना है, और खासकर वैसे विश्लेषण जो ज्यादा बड़े बुद्धिजीवी कर रहे हैं, वो एक विचित्र पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। इस पूर्वाग्रह का एक उदाहरण है यह बयान कि लोगों ने नोटबंदी की तकलीफों के बावजूद मोदी जी को वोट दिया है और वो इस विश्लेषण में लगे हैं कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ!!

पूर्वाग्रह यह है कि लोगों को नोटबंदी से तकलीफ़ हुई थी। और उनके हिसाब से यह तकलीफ़, तकलीफ़ वाली तकलीफ़ थी, वैसी तकलीफ़ नहीं जो व्यायाम करते वक़्त होती हो। किसी से पिट जाए, भोजन के अभाव में भूखे सोना पड़े, वैसी तकलीफ़ हुई थी, ना कि उपवास में होने वाली तकलीफ़!!

मैं यह नहीं कहता कि किसी को नोटबंदी से तकलीफ़ नहीं हुई थी, कुछ लोगों को हुई थी, मगर ज्यादातर लोगों को कोई तकलीफ़ नहीं हुई थी, और मैने तो एक भी ऐसा (ग़रीब) आदमी नहीं देखा था जिसको नोटबंदी से तकलीफ़ हुई हो, बल्कि ज्यादातर लोग तो खुश थे और लाइन में खड़े होकर चुटकियाँ ले रहे थे। बाज़ार का माहौल और टीवी स्टूडियो का माहौल एक दम अलग था।

मगर फिर भी यह बात बोली जा रही है कि लोगों को और खासकर ग़रीबों को बड़ी तकलीफ़ हुई थी। मानो वो सच मानते थे कि किसानों और ग़रीबों ने पोटलियों में बाँध कर पैसे रखे थे अपने अपने घरों में। आधी जनता ग़रीबी रेखा से नीचे है, और बाकी बचे उनमे से आधे 100 रुपया भी दिन भर में नहीं कमाते हैं, लेकिन वो नोटबंदी से परेशान थे, यही वो विचित्रता है। और फिर भी इनलोगों ने मोदी जी को वोट दे दिया। क्यों दे दिया इसी बात का विश्लेषण करने में ये लगे हैं।

ऐसा एक पूर्वाग्रह मैंने अपने इतिहास की किताबों में भी पढ़ा था; साइमन कमीशन के रिपोर्ट के समय। अगर आपने थोडा भी इतिहास पढ़ा होगा या अगर आपने रंग दे बसंती मूवी भी देखी हो तो शायद आपको याद हो कि साइमन कमीशन का विरोध भारत की आज़ादी की लड़ाई का एक बहुत हीं महत्वपूर्ण पड़ाव था।

इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय को अँगरेज़ पुलिस ऑफिसर सैंडर्स ने लाठी से मारा था, जिसमे उनकी मौत हो गयी थी। इसी के बाद भगत सिंह वगेरह ने यह सोचा था कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे अँगरेज़ हुक़ूमत की नींव हिल जाए। उसके आगे जो हुआ वो तो इतिहास है उसपे फिर कभी, पर अभी तो यह पुछा जाए कि आखिर साइमन कमीशन का विरोध हो हीं क्यों रहा था।

साइमन का विरोध इसलिए हो रहा था क्योंकि इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। यह कमीशन अंग्रेजों ने यह जानने के लिए बनाया था कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में क्या सुधार लाया जाए, मगर इस कमीशन में कोई हिंदुस्तानी नहीं था। क्यों नहीं था!! यह भी एक मज़ेदार पूर्वाग्रह था, और यह पूर्वाग्रह अभी भी कम से कम क्रीम बुद्दिमानों में है और उस विचित्र पूर्वाग्रह का मूल कारण है जिसका जिक्र मैंने एकदम शुरू में किया है।

अंग्रेजों का यह मानना था कि कोई भी हिंदुस्तानी अपने जात, समुदाय या धर्म के हितों से आगे सोंच हीं नहीं सकता। यह उनका मानना था और अकाट्य तरीक़े से मानना था!! गली मोहल्ले में यहाँ साधू और फ़कीर पड़े थे, फिर भी यह मानना था। था ना यह विचित्र पूर्वाग्रह।।

उनका मानना था और मानना ‘वैज्ञानिक’ था जैसे कि नोटबंदी से भारत के गरीबों को बड़ी तकलीफ़ हुई थी, यह मानना वैज्ञानिक है, उसी तरह से उनका यह मानना था कि भारतीय समाज जाति और धर्म के आधार पर इस क़दर विभाजित थी कि वो कभी भी उससे परे सोंच हीं नहीं सकते थे। उनके हिसाब से पहले धर्म के आधार पे यह विभाजन हुआ था। कैसे हुआ था यह देखते हैं।

धर्म पे विभाजित कैसे था!! इस ज्ञान में तो शक़ की कोई गुंजाइश हीं नहीं थी क्योंकि यह तो एक ऐतिहासिक तथ्य था। नहीं !! इसके मूल में क्या है!!

एक समय यहाँ मुसलामानों का आक्रमण हुआ और उन्होंने यहाँ पर एक इस्लामिक राज्य की स्थापना की। मुसलामानों ने हिन्दुओ को युद्ध में हरा दिया, हिन्दू हार गए थे और जज़िया कर देते हैं।  मुसलमान यहाँ विजेता थे। 

इस बात को अभी भी यहाँ इतिहास की क्लास में पढ़ाया जाता है और बच्चे उसे रटते हैं। इतिहास को रटने के अलावा यहाँ कोई उपाय भी नहीं है पास करने के लिए क्योंकि उसको समझा नहीं जा सकता है। 

असत्य को भला कोई कैसे समझेगा।।

क्या इतिहास में ऐसा कोई युद्ध हुआ है जिसमे एक तरफ मुसलमान और दूसरी तरफ हिन्दू रहें हो!! नहीं हुआ है और यह सच्चाई हम सभी जानते हैं। ग़ोरी के साथ भी जयचंद था जिनके बहन को उठा के या भगा के चौहान ले गए थे। मैं यहाँ पे किसी की साइड नहीं ले रहा हूँ पर जयचंद उस साइड में था। और जयचंद हिन्दू था।

कासिम के आक्रमण के समय भी राजा दाहिर के ब्राह्मण मंत्री ने कासिम को क़िला भेदने का उपाय बताया था। मुगलों के साथ तो खैर राजपूत थे हीं। औरंगजेब के सेना में भी राजपूत थे और इब्राहिम गर्दी, शायद याद हों आपको,कभी सुना या पढ़ा होगा; मराठो के तोपची थे।

तो ऐसा कोई युद्ध, जहाँ तक मेरा पढ़ा है, कभी हुआ हीं नहीं था, जिसमे एक साइड मुस्लिम और दूसरे साइड में हिन्दू हो।सच तो यह है कि इस तरह के दंगे बहुत हुए हैं और यह अँगरेज़ सरकार की देन है हिन्दुस्तानियो को। यह उनके पढ़ाये हुए इतिहास का परिणाम था। 

क्या भारत में कभी कोई इस्लामिक हुकूमत थी!! नहीं थी!!मुसलमान राजा थे मगर मुस्लिम राज नहीं था, जैसे अभी भी हिन्दू PM है पर हिन्दू राष्ट्र नहीं है।

और कुछ नहीं तो इक़बाल के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 1938 में दिए गए उस व्याख्यान को पढ़ लीजिये, कहतें हैं इसी तक़रीर ने पाकिस्तान मूवमेंट को जन्म दिया था, जिसमे उन्होंने यह बात कही है कि हिंदुओं को इस बात से घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है कि मुसलमान बहुल क्षेत्र में उनके ऊपर मुसलमानी कानून थोप दिया जाएगा। मुसलमान जब राजा थे तो भी उन्होंने कभी भी यहाँ सूदखोरी को गैर क़ानूनी नहीं बनाया गया था और इक़बाल के हिसाब से पाकिस्तान मांगने का एक बहुत बड़ा कारण हिंदुस्तानी इस्लाम को अरब imperialism के ठप्पे से आज़ाद कराना था।

अरब इम्पेरलिस्म के ठप्पे से आज़ाद कराने का मतलब यह है कि यहाँ के लोगों ने तलवार से डरकर इस्लाम नहीं अपनाया था बल्कि अपनी मर्ज़ी से अपनाया था, और इस्लाम का सबसे बेहतरीन उदाहरण हिन्दुस्तान में आया था। 

मोहम्मद साहिब को पूरब से जो खुशबु आयी थी वो काफ़िरों के ज़िंदा जलने की नहीं आयी थी, बल्कि वो ईद की सेवई और बक़रीद के मटन की आयी थी जो हम सभी ने खायी है।

 जैसे समझे कि अंग्रेज यहाँ दो सौ साल में भी सब मर्द को पैंट नहीं पहना पाये थे मगर बीस साल के liberalisation में अब हर घर में लड़कियां जीन्स पहन रही है। मगर liberlasation से, अपनी इच्छा से, ना की शाषण के जोर से। और अब तो शायद हीं किसी सभ्य घर में लड़कियों का जीन्स पहनना सांस्कृतिक पतन माना जाता है।

और मुझे पूरी उम्मीद है कि इस नए इस्लामिक स्टेट को सबसे तगड़ी लात पाकिस्तान से हीं मिलेगी, जैसे अभी तालिबानियों को मिल रही है।

अब थोडा हिंदुओं के तरफ देखे। आपको याद है अकबर ने किसके ख़िलाफ़ पानीपत की दूसरी लड़ाई लड़ी थी। हेमू के ख़िलाफ़। हेमू एक हिन्दू बनिया था।

पहले तो हेमू हिन्दू था, और मैं बाबर के विजय के बाद की बात कर रहा हूँ, कैसे उस चरम मुस्लिम राज में एक हिन्दू राजा बन गया और वो भी बनिया। बनिया कैसे राजा बन गया था, अगर भारत का समाज इतना हीं जाति से विभाजित था तो कैसे एक बनिया अचानक से राजा बन गया!!

भारत के इतिहास का सबसे प्रसिद्द राजा जिसका नाम हम सब जानते हैं, यह बात और है कि उसका नाम कम से कम मैंने तो इतिहास के किताबों में नहीं हीं पढ़ा था पर फिर भी जानता हूँ। वो हैं राजा भोज। वही “कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली वाले राजा भोज।” शायद आपको जान के आश्चर्य हो कि राजा भोज 1000 ईशवी 1000 AD में राजा थे, वो भी मालवा के क्षेत्र में। और बड़े वीर और स्कॉलर राजा थे।

सच तो यह है कि भारत में कभी भी ऐसा समय नहीं था जब पूरे हिन्दुस्तान में किसी एक संप्रदाय का यहाँ राज रहा हो और न हीं कभी होगा। अभी भी इस भीषण मोदी लहर में भी कांग्रेस जीती है पंजाब में और अच्छे खासे बहुमत से जीती है। 

हिंदुस्तान में विविधता है और बिना एकता के किसी समाज में इतनी विविधता नहीं रह सकती।

यह बात सभी अकादमिक चर्चाओं में बोली जाती है कि जाती की यह कड़ी व्यवस्था अँगरेज़ साम्राज्य की देन है। राजा भोज वाले गंगू तेली की कहावत को हीं देख लीजिये। 

तेली का काम करना किस समाज में बहुत गर्व की बात होती है। मान लो मैं तेली पैदा हो जाता और मुझसे बोला जाता कि मैं सिवाय तेली के और कोई काम कर हीं नहीं सकता तो क्या मुझे बहुत अच्छा लगता। oil baron एक और बात है मगर मेरी ज़िन्दगी सिर्फ सरसों को पीस के तेल निकालने की होती तो मुझे तो अच्छा नहीं लगता, सबसे तगड़ा बैल मेरे घर में होता, तो भी नहीं!!

ठीक वैसे हीं, जैसे आज मैं ब्राह्मण हूँ तो मुझे ये बोल दिया जाए कि मैं सिर्फ पंडिताई करूँ तो क्या मुझे अच्छा लगेगा!!

हिंदुस्तान में पंडिताई का मतलब क्रिस्चियन के पादरी वाला नहीं है। यहाँ इस तरह की पंडिताई के काम करने वालो को कभी भी बहुत इज़्ज़त के साथ नहीं देखा गया है। और यह जातिगत व्यवस्था अंग्रेजों के राज में हमारे ऊपर थोप दी गयी थी। और ऐसी कोई व्यवस्था कभी भी टिक नहीं सकती और टिकी भी नहीं।

हमारे समाज में भद्र मणिशंकर अइयर तो भड़े पड़े हैं जो मोदी जी को सिर्फ चाय बेचते हुए हीं देख सकते हैं मगर क्या ऐसा हुआ। वो जीतें या हारे!! मणिशंकर अइयर हारे और हमेशा हारेंगे।

वर्ण व्यवस्था और है, और जाति व्यवस्था कुछ और है। जाति शब्द जन्म से आता और वर्ण आपके चरित्र से। दुनिया में व्यवस्था वर्ण से बनानी चाहिए, ना की जाति के आधार पर।

आप सिर्फ ब्राह्मण जाति में पैदा हो गए तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपका वर्ण भी ब्राह्मण का हो गया। वर्ण आप वरण करते हैं, जाति आप जन्मते हैं। हम ज्यादातर लोग अपने जन्म के आधार पर हीं अपनी ज़िन्दगी बनाते हैं। मगर सिर्फ जन्म से न तो कभी भी किसी का वर्ण आधारित होता है और न कभी होगा।

मगर हम यह मान के बैठे हैं कि हिंदुओं की वर्ण व्यवस्था वास्तव में जाति व्यवस्था हीं है। यही है पूर्वाग्रह। जैसा कहा मैंने, एक विचित्र पूर्वाग्रह।।

इसी बात को लेकर, चार पंक्तियाँ है, पेश करता हूँ…..

आप लोगों में से अगर कोई ब्राह्मण है तो सामने आइये

इस तरह से तो हमेशा शूद्रों की तरह मंत्र नही पढ़ा कीजिये।

बाकी तो जो आप मुसलमान हैं आप अज़ान मत बोलिये

वरना आप ख़ुदा के वास्ते घुटनों में बैठ कर नमाज पढ़िए।।

 

 

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