नल और दमयन्ती की कहानी पार्ट II

कलयुग की बात सुनकर देवताओं ने कहा…

“दमयंती ने हमारी आज्ञा लेकर राजा नल का वरण किया है। राजा नल हर प्रकार से दमयन्ती के लिए उत्तम वर हैं। वो यज्ञों में देवताओं को तृप्त करते हैं तथा किसी को नहीं सताते हैं। उन्होंने वेदों सहित इतिहास-पुराण का अध्ययन किया है, वो सत्यनिष्ठ तथा दृढ़निश्चयी हैं। उनकी चतुरता, धैर्य, ज्ञान, तपस्या, पवित्रता, दम और शम लोकपालों के सामान हैं, उनको श्राप देना धधकती आग में गिरने के समान हैं….”

ऐसा कहकर देवतागण वहां से चले गए।

अब कलयुग ने द्वापर से कहा…

“भाई मैं अपने क्रोध को शांत नहीं कर सकता। मैं नल के शरीर के अंदर घुसकर उसे राज्यचुत कर दूंगा, फिर वो दमयन्ती के साथ भी नहीं रह पाएंगे। तुम भी जुए के पासे में प्रवेश कर मेरी सहायता करना…”

द्वापर ने कलयुग की बात मान ली और उस दिन से वो दोनों राजधानी में आ बसे। बारह वर्ष तक वो इस प्रतीक्षा में रहे कि नल में कोई दोष दिख जाए।

एक दिन राजा नल संध्या काल में लघुशंका के बाद बिना पाँव धोये सिर्फ आचमन करके संध्या वंदना* के लिए बैठ गए। यह अपवित्र अवस्था देख कर कलयुग उनके शरीर में प्रवेश कर गया, और दूसरा रूप धारण करके उनके भाई पुष्कर के पास गया और उनसे कहा…

“तुम राजा नल के साथ जुआ खेलो और मेरी सहायता से निषध देश का राज्य प्राप्त कर लो…”

कलयुग की बात मानकर पुष्कर राजा नल के पास गया, उधर द्वापर भी पासों का रूप धारण कर उनके साथ हो लिया।

राजा नल के पास आकर पुष्कर उन्हें बार बार जुआ खेलने के लिए उकसाने लगा। दमयन्ती के सामने राजा नल बहुत देर तक पुष्कर के ललकार को सह न सके और वो जुआ खेलने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने उसी समय पासे खेलने का निश्चय कर लिया और उनके बीच जुआ शुरू हो गया।

उस समय राजा नल के अंदर कलयुग का प्रवेश था, इस कारण रथ, हाथी, घोडा, सोना, जो वो दाँव में लगाते हार जाते। प्रजा और मंत्रियों ने बड़ी व्याकुलता से उन्हें जुए से रोकना चाहा और वो आकर द्वार पे खड़े हो गए।

द्वारपाल ने आकर इसकी सूचना दमयन्ती को दी। उसने कहा …

“आप महाराज से कहे वो धर्म और अर्थ के तत्वज्ञानी हैं, और सारी प्रजा और मंत्रिमंडल आपके दुःख के कारण आपके दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गयी है…”

उस समय दमयन्ती स्वयं दुःख से निर्बल और अचेत होती जा रही थी। उसने आकर राजा नल को यह सूचना दी कि सारी प्रजा मंत्रिमंडल के साथ उनके द्वार पे खड़े हैं और वो उनसे मिलना चाहतें हैं।

परंतु कलयुग के प्रभाव से राजा नल ने कुछ नहीं कहा और जुआ खेलते रहें। निराश होकर सारी प्रजा और मंत्रिमंडल के लोग वापस चले गए।

महीनो तक राजा नल और पुष्कर के बीच जुआ चलता रहा तथा राजा नल लगातार हारते रहें। वो जो पासा फेकते वही उल्टा पड़ जाता और धीरे धीरे वो सारा धन, राज्य-पाट हारते चलें गएँ।

तब दमयन्ती ने अपने सारथी वार्ष्णेय को बुलाकर कहा..

तुम बच्चों को लेकर मेरे घर कुण्डिनपुर चले जाओ। रथ और घोड़ों को भी वहीं छोड़ देना। मन हो तो वहीं रह जाना अथवा जहाँ इच्छा हो चले जाना।

सारथी ने बच्चों को कुण्डिनपुर पहुँचा दिया और वहां से वो अयोध्या आ गया और वहां के राजा ऋतुपर्ण के यहाँ वो सारथी का काम करने लगा।

उधर राजा नल अपना सब कुछ जुए में हार बैठे। जब उनके पास कुछ नहीं बचा तो पुष्कर ने उल्हास भरे शब्दों में कहा…

“अब तो तुम्हारे पास कुछ भी नहीं बचा। अगर दमयन्ती को दांव में लगाने लायक समझते हो तो बोलो!!”

यह सुनकर राजा नल दुःख से खड़े हो गए और अपने सारे वस्त्र और आभूषण उतार कर सिर्फ एक हीं वस्त्रों में नगर के बाहर की दिशा में चल पड़े। दमयन्ती भी उनके पीछे-पीछे सिर्फ एक वस्त्रों में उन्ही के साथ चल पड़ी। उनके पीछे-पीछे सारी प्रजा चल पड़ी।

जुए में हारने के बाद तीन दिनों तक वो नगर के बाहर सीमा पर केवल पानी पीकर पड़े रहें। उधर पुष्कर ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो भी नल के साथ सहानभूति दिखायेगा उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जायेगी। इस डर से कोई भी उनका स्वागत ना कर सका।

तीन दिनों के बाद भूख से व्याकुल होने पर दोनों ने फल-मूल खा कर अपनी भूख शांत की और फिर वहां से चल पड़े।

एक दिन राजा नल ने देखा अपने आस पास बहुत से पक्षियों को देखा जिनके पर सोने के समान दमक रहे थे। राजा नल ने सोचा उनके पंखों को बेचकर कुछ धन मिलेगा और उन्हें पकड़ने के लिए उनपर अपना वस्त्र डाल दिया। पक्षी उनके वस्त्र को ले के उड़ पड़े और उड़ते-उड़ते कहा…

“अरे दुर्बुद्धे!! तू नगर से एक वस्त्र पहन कर निकला था। उसे देख कर हमें बड़ा दुःख हुआ। लो हम अब वो एक वस्त्र भी लिए जाते हैं। हम पक्षी नहीं जुए के पासे हैं!!!”

राजा नल ने पक्षियों वाली बात दमयन्ती को बता दी और उनसे कहा…

“प्रिये ! तुम देख रही हो, इधर बहुत से रास्ते हैं, यह रास्ता अवंती को जाता है, दूसरा ऋक्षवान् पर्वत होते हुए दक्षिण देश को जाता है। सामने विंध्यांचल पर्वत है। यह पयोष्णी नदी समुद्र में मिलती है, और वह रास्ता विदर्भ को जाता है…”

वो दमयन्ती को सारे रास्तों का ज्ञान देने लगे। इस पर दमयन्ती के आँखों से आंसू गिरने लगे और वो गदगद स्वर में बोली…

“महाराज आप क्या सोच रहें हैं। आपका राज्य चला गया, धन गया, शरीर पे वस्त्र नहीं है, भूखे-प्यासे हैं, क्या ऐसी अवस्था में मैं आपको इस निर्जन वन में छोड़कर जा सकती हूँ। मैं आपके साथ रहकर आपका दुःख दूर करूंगी। दुःख की अवस्था में पत्नी औषधि का काम करती है, यह बात तो वैद्य भी मानते हैं…”

नल ने कहा

“तुम्हारा कहना ठीक है, पत्नी मित्र है, पत्नी औषध है, परंतु मैं तो तुम्हारा त्याग करना नहीं चाहता हूँ। तुम भला ऐसा क्यों सोचती हो…”

दमयन्ती ने कहा…

“फिर आप मुझे विदर्भ देश का मार्ग क्यों बता रहे हैं। मैं जानती हूँ, आप मेरा त्याग नहीं करना चाहते हैं, पर इस दुःख की घड़ी में मैं व्याकुल हो रही हूँ, अगर आप मुझे मेरे पिता के यहाँ भेजना चाहते हैं, तो आप भी मेरे साथ चले। वो आपका बहुत सत्कार करेंगे…”

इस पर राजा नल ने कहा…

“प्रिय तुम्हारे पिता राजा हैं, एक समय मैं भी राजा था। अब मैं संकट में पड़कर उनके पास नहीं जाऊँगा।”

राजा नल दमयन्ती को समझाने लगे। तदन्तर एक हीं वस्त्र से शरीर ढककर दोनों वन में विचरने लगे। भूख प्यास से व्याकुल होकर एक दिन वो एक धर्मशाला में आ पंहुचे।

रात वो धर्मशाला में हीं सो गए।

रात में अचानक नल की नींद टूटी तो उन्होंने देखा धूल- धूसरित उनकी प्राण प्रिय दमयन्ती बिना किसी चटाई के ऐसे हीं जमीन पे सो रही है। यह देखकर उनका मन द्रवित हो गया। वो सोचने लगे….

“देखो!! यह दमयन्ती कितने नाजो से अन्तःपुर में पली बढ़ी है, यह विदर्भ देश के राजा की पुत्री और मेरी रानी थी। कभी महलों के अंदर रहती थी, कोई इसे छू भी नहीं सकता था, और आज ये ऐसे हीं एक वस्त्र में सिर्फ जमीन पे सोयी है !!

इतना दुःख इसे मेरे सानिध्य के कारण हीं उठाना पड़ रहा है। अगर मैं अभी इसे छोड़ दूं, तो यह अवश्य हीं अपने पिता के पास वापस चली जायेगी। इससे उसे कुछ सुख तो मिल जाएगा।

इस प्रकार उन्होंने दमयन्ती का त्याग करने का निश्चय कर लिया।

राजा नल ने फिर यह विचार किया कि इसके शरीर पर एक हीं वस्त्र है, और मैं नंगा हूँ। इसी के वस्त्र से आधा फाड़ लेना उचित होगा, पर इसे बिना जगाये वस्त्र कैसे फाडूँ!!

उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा कि कैसे बिना जगाये उसके शरीर से थोडा वस्त्र निकाला जाए और यही सोचते हुए वो धर्मशाला में हीं इधर उधर घूमने लगे। तभी उन्हें एक म्यान में एक तलवार दिखी। उस तलवार से उन्होंने आधा वस्त्र फाड़कर अपने ऊपर लपेट लिया और दमयन्ती को एक नजर देख कर वो धर्मशाला से बहार निकल गए।

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर उनका हृदय शांत हुआ और वो वापस धर्मशाला में लौट आएं। वहां उन्होंने फिर दमयन्ती को जमीन में सोते देखा और फिर उनका हृदय द्रवित हो गया। वो वही पे रोने लगे।

“ओह्ह कभी यह परदे के अंदर रहती थी और कोई इसे छू भी नहीं सकता था, आज यह आधे वस्त्र में अनाथों की तरह धूल में पड़ी है…”

उन्होंने फिर त्याग का निश्चय किया और वो फिर बाहर निकल आये। फिर कुछ देर बाद वापस आ गए। इस तरह से बार-बार वो झूले की तरह अंदर-बाहर करते रहे।

मगर उस वक़्त उनके अंदर कलयुग का प्रवेश था, जिससे उनकी बुद्धि नष्ट हो चुकी थी। अंततः उन्होंने दमयन्ती को “आदित्य, वसु, रूद्र अश्विनीकुमार आदी देवता तुम्हारी रक्षा करे!!” बोलकर उसे उसी जंगल में छोड़कर बाहर निकल आएं।

सुबह अपने आस पास नल को देख कर दमयन्ती बदहवाश सी उन्हें ढूँढने के लिए रोते रोते धर्मशाला से बाहर निकल आयी और इधर-उधर जंगल में भटकने लगी। इसी उन्मत्ता में वो एक अजगर के पास चली आयी और वो अजगर दमयन्ती को निगलने लगा। उस समय भी उसे अपनी नहीं पर राजा नल की चिंता थी कि अकेले वो जंगल में कैसे रहेंगे। वह पुकारने लगी….

“स्वामी! यह अजगर मुझे निगलता जा रहा है, आप आकर मेरी रक्षा क्यों नहीं करते…

उसी समय एक व्याध की नजर दमयन्ती पर पड़ी। उसने अपने तेज अस्त्र से अजगर को काट डाला और दमयन्ती को सांत्वना देने लगा।

दमयन्ती रो-रो कर व्याध से अपनी दुखी कथा कहने लगी। दमयन्ती की बात-चीत और सुंदरता को देख कर व्याध काम-मोहित हो गया और अपनी मीठी-मीठी बातों से उसे फुसलाने लगा। दमयन्ती उसका अभिप्राय जान गयी और व्याध को दूर हटाने लगी। काममोहित व्याध जब किसी तरह से ना माना तो दमयन्ती ने क्रोधित होकर कहा…

“अगर राजा नल के अलावा मैंने और किसी भी पुरुष का मन से चिंतन ना किया हो तो ये पापी क्षुद्र व्याध अभी तुरंत जमीन में गिरकर मर पड़े…”

दमयन्ती का इतना कहना था और वो व्याध एक जले हुए ठूंठ की तरह गिर गया। क्षण भर में उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

व्याध के मर जाने पर दमयन्ती वहां से भटकती हुई ऋषियों के एक आश्रम में आ पंहुची। वहां ऋषियों के पास आकर उसने बड़ी विनम्रता से कुलीन घर की स्त्रियों की भाँती उनसे पुछा…

आपकी तपस्या, अग्नी, धर्म, और पशु, पक्षी तो सकुशल हैं ना? आपके धर्माचरण में कोई विघ्न तो नहीं?

ऋषियों ने कहा…

हम सब तो सकुशल हैं। तुम यहाँ कैसे आयी हो। हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा हैं, कहीं तुम वन, पर्वत और नदियों की देवी तो नहीं हो ??

इस पर दमयन्ती ने कहा…

“मैं कोई देवी नहीं, साधारण नारी हूँ। मैं विदर्भ नरेश राजा भीष्मक की पुत्री दमयन्ती हूँ …”

और उसने अपना सारा वृतांत उन ऋषियों को सुनाया।

ऋषियों ने कहा…

“देवी! हम अपने तपोदृष्टि से देख रहें हैं, तुम्हारा कष्ट अब बस कुछ हीं दिन और है, और आगे चलकर तुम्हे बहुत सुख मिलेगा, और कुछ हीं दिनों में तुम्हे राजा नल के दर्शन होंगे…”

इतना कह कर वो सभी तपस्वी अपने आश्रम के साथ अन्तर्धान हो गए।

दमयन्ती को यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ।

“भला ये सारा उपवन महर्षि और उनके आश्रम के साथ कहाँ गायब हो गया… अवश्य मैंने कोई स्वपन देखा होगा!!”

ऋषियों की बात सुनकर जो प्रसन्नता उसके चेहरे पर आयी थी, वो गायब हो गयी और वो पुनः उसी वन में अकेली भटकने लगी। भटकते भटकते उसने वन में व्याप्यारियों का एक बहुत बड़ा झुण्ड देखा।

उनके झुण्ड में उनके साथ बहुत सारे हाथी-घोड़े थे। झुण्ड के प्रधान से बात करने पर उसे पता चला कि वो लोग चेदिदेश के राजा सुबाहु के यहाँ जा रहे हैं। दमयन्ती व्यापारियों के प्रधान की आज्ञा लेकर उन्ही के साथ हो ली।

एक दिन रात में जंगल में जब वो सो रहे थे, अचानक उनके हाथियों के ऊपर जंगली हाथियों का एक झुण्ड टूट पड़ा और इस भगदड़ में सारे के सारे व्यापारी नष्ट-भ्रस्ट हो गए। इस महासंहार का दृश्य देखकर दमयन्ती बावली सी हो गयी। उसने आज तक कभी ऐसा दृश्य नहीं देखा था।

बचे कुछ संयमी और वेदपाठी ब्राह्मणों के साथ वो किसी तरह एक वस्त्र में चेदिदेश की राजधानी पंहुची। उसके हाल को देख कर नगर के बच्चे उसे पागल समझ कर उसके पीछे लग गएँ। चेदिदेश की राजमाता उस समय राजमहल की खिड़की में बैठी थी। दमयन्ती को देख कर उसने उसे अपने पास बुला लिया और कहा…

“दिखने में तो तुम असहाय और दुखिया जान पड़ती हो फिर तुम्हारा शरीर इतना सुन्दर कैसे है ?? इस अवस्था में भी तुम किसी भी तरह से भयभीत नहीं दिखती हो!! तुम कौन हो??”

इस पर दमयन्ती ने कहा…

मैं एक पतिव्रता नारी हूँ। मैं अंतःपुर में रह चुकी हूँ। मेरे पतिदेव बहुत गुणी पुरुष हैं और मुझसे प्रेम भी बहुत करते हैं, पर फिर भी पता नहीं क्यों बिना किसी अपराध के वो मुझे रात में अकेला सोते हुए छोड़कर चले गए हैं। मैं उन्ही की तलाश कर रही हूँ।

इतना कहकर वो रोने लगी…..

राजमाता का ह्रदय उसके रोने से द्रवित हो गया। उसने कहा…

“कल्याणी! मुझे तुम पर बड़ा प्रेम आ रहा है। तुम यही रहो। मैं यहीं से तुम्हारे पति को ढूँढने का प्रबंध करवाती हूँ। तुम यहीं उनसे मिलना…”

इस पर दमयन्ती ने कहा…

“मैं एक शर्त पर यहाँ रह सकती हूँ। मैं कभी जूठा नहीं खाऊँगी, किसी के पाँव नहीं धोऊँगी और कभी किसी पर-पुरुष से किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं करूंगी। अगर कोई पर पुरुष मुझसे दुष्चेष्टा करे तो आप उसे दंड देंगी। और अगर कोई बार बार यह करे तो उसे प्राणांत का दंड भी देना होगा। और अपने पति की सूचना के लिए मैं ब्राह्मणों से बात करती रहूंगी। अगर आपको मेरी बात स्वीकार हो तो मैं आपके साथ रहूंगी।”

राजमाता ने उसकी सारी बाते मान ली, फिर इसके बाद राजमाता ने अपनी पुत्री सुनंदा को बुलाकर उससे कहा…

“देखो! इस दासी को आज से तुम देवी समझना। यह अवस्था में तुम्हारे बराबर की है, इसलिए इसे सखी की तरह राजमहल में रखना और प्रसन्नता के साथ इससे अपना मनोरंजन करते रहना…”

सुनंदा बड़ी ख़ुशी के साथ दमयन्ती को अपने महल में ले गयी।

उधर राजा नल दमयन्ती को त्याग कर एक वन में पंहुचे जहाँ दावाग्नि (जंगल की आग) लगी हुई थी। नल कुछ ठिठक से गए, तभी उन्हें अचानक से एक आवाज़ सुनायी दी…

“राजा नल!! शीघ्र दौड़ों, मुझे बचाओ!! …”

राजा नल ने कहा…

“डरो मत…”

क्रमशः

अंत अगले भाग में…

P.S. और अगर अभी तक अच्छा लगा हो तो अगले भाग का इंतज़ार कीजिये!!

 

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