सिनेमा का किताब *An updated post…!!

इस वीकेंड की मूवी थी Happay Bhag Jaayegi. मुझसे किसी ने पुछा कि कैसी थी मूवी? अब हम सभी जानते हैं कि सवाल में दम तो जवाब से आता है।

लोग जितनी आसानी से ये सवाल पूछ लेते हैं कि कैसी है फिल्म, कभी कभी मुझे शक़ होता है, वो यह जानते भी हैं या इतने नादान हैं कि ये भी नहीं जानते कि ये बताना “कैसी थी मूवी थी!!”, अपने आप में एक काम है या धंधा है। वैसे काम और धंधा में बहुत फर्क है। अगर रिव्यु के पॉइंट ऑफ़ व्यू से पूछू तो Birdman वाली जो थी वो रिव्यु का काम करती थी या धंधा। फ़िल्म इंडस्ट्री में रिव्यु करने वालों का एक अलग स्थान है।

बीच में तो इस सवाल के जवाब में कि कैसी थी मूवी, मैंने बोलना शुरू कर दिया था, दो स्टार है या तीन स्टार हैं!! लेकिन मुझे शक़ हुआ कि लोग शायद जान हीं नहीं रहें हैं कि मैं क्या बोल रहा हूँ । वैसे तो प्रोफेसर होने के नाते मैं इस बात का आदी हूँ कि मैं बोलू और लोग न समझे, पर फिर भी हम बोलना तो छोड़तें नहीं।

मतलब लोग शायद रिव्यु पढ़तें हीं नहीं हैं या और खुल के बोलूं तो शायद उन्हें पता भी न हो कि रिव्यु कुछ होता है, और हो सकता है कि उन्होंने कभी रिव्यु पढ़ा भी नहीं हो। हालाँकि अभी भी इतने अज्ञानी लोग हो ऐसा संभव नहीं है।

लेकिन अगर बैठे बैठे आप आस पास रिसर्च (मैं रिसर्च शब्द का बहुत हीं गन्दा इस्तेमाल कर रहा हूँ, कृपया माफ़ कर दे ) करें, तो शायद आप पाएंगे कि आपके आस पास बहुत सारे लोग वैसे होंगे, जिन्होंने सही में, कभी भी, कोई मूवी रिव्यु, अब आगे से मैं समीक्षा बोलूंगा, पढ़ा हीं नहीं होगा।

बहुत आश्चर्य की बात नही हैं है, क्योंकि रिव्यु न्यूज़पेपर में शनिवार को आता है और संडे को स्कूल बंद रहता है, तो बहुत सारे लोग जिनको स्कूल के कारण न्यूज़पेपर पढ़ने की आदत है या थी, वो लोग तो ऐसे हीं साफ़ हो गए। फिर सिनेमा भारत में अपने आप में पढ़ाई का विलोम शब्द माना जाता हैं, जैसे कि उपन्यास कोर्स की किताब का, ऐसे में फिर बहुत कम हीं लोगों होंगे, जिनके घर में फिल्म पत्रिकाएं आती होगी। अपने नानीघर के अलावा मैंने अपने आस पास में तो नहीं हीं देखा है।

नानीघर जाने एक उत्साह यह भी होता था कि पुरानी फिल्म पत्रिकाएं पढ़ने को मिलेगी। फ़िल्मी पत्रिकाओ की एक अपनी अलग दुनिया है। जहाँ तक मुझे लगता है कि फ़िल्मी पत्रिकाएं सबसे ज्यादा बिकने वाली पत्रिकाओं में होंगी, मगर फिल्म पत्रिकाओं पर फिर कभी।

अभी Happy Bhag Jaayegi…

तो मैंने बोला कि अगर कभी कभी मूवी देखते हो, मतलब कोई ओकेजन टाइप वाले हो, जैसे बर्थडे है, छुट्टी है तो मूवी देख लेते हैं, या सबसे वर्स्ट टाइप का क्राउड !! कॉलेज के दोस्तों का ग्रुप!! आउटिंग के प्लान पे जो हैं, देख लो ठीक है, आप हीं के लिए बनी है, एक परफेक्ट 3 स्टार मूवी है।

मगर अगर आप रेगुलर पार्टी हो तो शायद हल्का अफ़सोस लगे क्योंकि स्क्रिप्ट बहुत स्ट्रांग है ।

अच्छी स्क्रिप्ट थी। स्टार लेके बनातें, जैसे वेलकम टाइप तो, अच्छी कल्ट टाइप की हो सकती थी। पर फिर यह भी हो सकता था कि स्टार के साथ और खास कर इसमें तो मल्टीस्टार का स्कोप था (वेलकम टाइप), तो वो स्टार स्किप्ट एडजस्टमेंट का भी चक्कर हो जाता है, डायरेक्शन (यहाँ  स्टार कण्ट्रोल बहुत था) फिर उसके बात बहुत सॉलिड चाहिए।

जैसे जब डायना पेंटी पहली बार पाकिस्तान पंहुचती है, तो वो घर वाला सीन बहुत अच्छा सीन है, अभय या लड़की भी उसको पूरा खींच नहीं पाएं। अब खींच नहीं पाए मतलब, एक स्टार सीन को एक अलग लेवल पे जाता, पर अभय स्टार नहीं है !! पेंटी की तो स्टार बनने की शर्त हीं स्टार के साथ होना है ।

मगर देखिये पीयूष मिश्रा को, वो जमाया हैं , पर क्या पीयूष मिश्रा स्टार हैं ? क्यों नहीं???? क्या नाना पाटेकर स्टार नहीं है!! वैसे कितने लोग ऐसे हैं जो इस बात को जानते हैं कि पीयूष मिश्रा को सलमान के मैंने प्यार किया का रोल ऑफर हुआ था पर पीयूष स्क्रीन टेस्ट के लिए दिल्ली हीं नहीं गए। पूछने पर कि क्यों नहीं गए उसने कहा…

“बस नहीं गए बहन$#@!”

ये मैंने Caravan मैगज़ीन में पढ़ा था।

By the way क्या बोम्मन ईरानी स्टार है ??!!

तो वापस आएं हैप्पी भाग जायेगी पे। अब टेक्निकल रिव्यु न कर के अगर कुछ सीन बताऊँ, तो, बहुत दिनों के बाद किसी को और यहाँ तो स्क्रीन में हीरोइन को हाथ से चावल या बिरयानी खाते देखा। हॉस्टल के मेस में तो अब शायद हीं कोई हाथ से खाता हो। लेकिन सबसे बढ़िया हैं सीन है उर्दू वाला।

इसमें पीयूष मिश्रा पाकिस्तानी है तो हीरो क्योंकि डायना पेंटी, हीरोइन, उसको मिलती है, अभी तक तो लग रहा है कि एक और अच्छा रोल बर्बाद हुआ, रोल ऐसा था कि किसी को स्टार बना सकता था, जैसे ….. खैर तो ये हीरो पीयूष मिश्रा से बोलता है….

उर्दू बहुत शानदार भाषा है, शब्द इतने अच्छे लगते हैं सुनने में चाहे मीनिंग कुछ भी हो … जैसे तशरीफ़ … (तशरीफ़ लाइए जनाब) जब पता चला कि तशरीफ़ का मतलब क्या होता है तो हा हा हा हा……

और उसके बाद (वो पी रहे होते है छत पे बैठ के) यही बोलते वो छत की मुंडेर पे लघुशंका (हिंदी भी कम मज़ेदार नहीं है) करने जाता है तो वो चूँकि पीया है बिना नीचे देखे शुरू हो जाता है, और नीचे सो रहा आदमी भींगने से उठ जाता है और उसे ऊपर देख लेता है, अब वो दोनों उसे पकड़ने के लिए नीचे की और दौड़ते हैं और दौड़ते दौड़ते हीरो बोलता है  पीयूष मिश्रा से

अरे सर पकड़ो नहीं तो तशरीफ़ लग जायेगी 🙂

अब जो मैं स्टार वाली बात बोल रहा था, वो यहीं पे स्टार सीन को कल्ट बना देते हैं, लेकिन ये तशरीफ़ वाला सीन उतना उठा नहीं थिएटर में जितना उठना चाहिए था।

P.S. क्या औसत औसत हिंदी में पढ़ने वाले लोगों की बौद्धिक क्षमता इंग्लिश में पढ़ने वालों से ज्यादा अच्छी होती होगी, क्योंकि, अब ज्यादातर लोग अंग्रेजी मीडियम वाले हैं, तो उनके लिए अंग्रेजी अक्षरों को पढ़ना आसान है, क्योंकि अक्षर ज्यादा परिचित अंग्रेजी वाले हैं, मगर अगर आप थोड़ा आराम से हिंदी पढ़ ले रहें तो इसका मतलब है कि आपको पढ़ने की आदत है, और यह तभी संभव है जब आपने कोर्स के बाहर पढ़ाई की है, चूंकि सरस सलिल पढ़ने वाला तो यहाँ तक पहुंचेगा नहीं तो फिर निश्चित रूप से आपकी बौद्धिक क्षमता अच्छी होगी, इस थीम पे अब आगे…

 

 

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