नल और दमयन्ती की कहानी

नल और दमयन्ती की कहानी आज के ज़माने में कौन पढ़ना चाहेगा, सुनना शायद बहुत सारे लोग चाहे, पर पढ़ना कौन चाहेगा.

मगर महाभारत की सारी कहानियों में से, कम से कम मेरे दिल में, इस कहानी के लिए बहुत प्यार है, और इसी प्यार से मैं आपको नल और दमयन्ती की कहानी सुनाता हूँ, देखिये कहीं विवाद न खड़ा हो जाए, पर रमजान का पहला जुम्मा है, श्रद्धा से सुनियेगा।

नल और दमयन्ती की कहानी महाभारत में उस समय आती है जब अर्जुन अस्त्रविद्या सीखने के लिए स्वर्गलोक की यात्रा पे थे। उस समय एक तो अर्जुन के वियोग का गम और ऊपर से वनवास का कष्ट। यहाँ पे युद्धिष्ठिर और भीम के बीच बड़ा सुन्दर सा दृश्य भी हुआ था जिसमें “शाँत गदाधारी भीम !!! शाँत!! ” वाले भीम के दर्शन होते हैं, और इसी बीच वहां पे बृहदश्व ऋषि का आगमन होता है।

बृहदश्व ऋषि के उचित अंदर सत्कार और उनके विश्राम के बाद युद्धिष्ठिर ने ऋषि को कहा कि दुनिया में कोई भी राजा मुझसे ज्यादा अभागा नहीं रहा होगा, जिसने जुए में इस तरह अपना सब कुछ हार दिया हो।

इसपर ऋषि ने कहा कि, और उन्ही के शब्दों में…

“धर्मराज! आपका यह कहना ठीक नहीं है कि मुझ-सा दुखी राजा कौन होगा, क्योंकि मैं एक तुमसे भी अधिक दुखी और मन्दभाग्य राजा  का वृतांत जानता हूँ, और तुम्हारी  इच्छा हो तो मैं सुनाऊ।।”  

 फिर यहाँ पे राजा नल और दमयन्ती की कहानी महाभारत में आती है. देखिये महाभारत इसी तरह से अनेक कहानियां आती हैं, यहाँ तक की रामायण की भी कहानी आती है, और हर जगहों पे कहानियां कहे जाने का एक तुक है. जैसे यहाँ पे राजा नल की कहानी, वो भी अपना सर्वश्व जुए में हार जाते हैं, तो कौन थे राजा नल?

राजा नल निषध देश के राजा थे।  यहाँ पे मैं महाभारत के बारे में एक और बात बताना चाहूंगा कि महाभारत में नामों का गजब उपयोग हुआ है।  जैसे कि जब आप ये नाम दे देते हैं, जैसे निषध देश के राजा तो उसका कुछ प्रभाव पड़ता है ।  ये कहानी बिना नाम के भी बोली जा सकती थी, नल राजा थे बस , कहाँ के राजा थे इतना details क्यों। जैसे महाभारत में धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के नाम हैं. और वो actually text में आतें हैं. एक एक को भीम कैसे मारते हैं वो भी आता है text में।  जैसे अब आप इसी कहानी में नाम count कीजिये.

तो राजा नल निषध देश के राजा थे, उनके बारे में अलंकार इस्तेमाल किये गए हैं वो है, वो “बड़े गुणवान, परम सुन्दर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय सबके प्रिय, वेदज्ञ और ब्राह्मण भक्त” थे। वीर, योद्धा, उदर और प्रबल पराक्रमी भी थे।  उन्हें जुआ खेलना का भी कुछ कुछ शौक़ था।

अब उन्ही दिनों में विदर्भ देश में एक और राजा थे, उनका नाम भीमक था।  उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संताने वर में प्राप्त की थी (अब इस तरह के वरदानों का क्या मतलब होता होगा, मेरे ख्याल से इस तरह की study होती है, जैसे मेरे ख़याल से Vicky Donor में है ऐसा कुछ डायलॉग ) तीन पुत्र और एक पुत्री, दमयन्ती, पुत्रों के नाम दम , दान्त और दमन।

दमयन्ती के बारे में कहते थे उस समय देवताओं और यक्षों मैं भी वैसे सुन्दरी कन्या दिखने में नही आती थी। अब देखिये उनमे प्यार कैसे हुआ।

जो लोग विदर्भ देश से निषध जाते वो राज नल को दमयन्ती के रूप और गुणों का वर्णन करते और वैसे हीं जो भी निषध देश से विदर्भ आते वो राज नल के रूप, गुण और उत्तम चरित्र की बात दमयन्ती को बताते।

इससे दोनों के हृदय में एक परस्परकि अनुराग अंकुरित हो गया।  

एक दिन राजा को अपने महल के उद्यान में हंसो का एक झुण्ड दिखाई दिया।  राजा नल ने उन में से एक हंस को पकड़ लिया, तो इस पर उस हंस ने कहा….

राजा नल !! मुझे जाने दो!! हम दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का इतना वर्णन करेंगे कि वो आपको अवश्य से अवश्य वर लेगी।  

इस पर राजा नल ने हंसो को उड़ जाने दिया।  हंसो ने सचमुच दमयन्ती के पास जाकर राजा नल की इतनी प्रंशसा की, कि दमयन्ती को सचमुच उनसे प्यार हो गया। उसकी आसक्ति राजा नल के प्रति इतनी बढ़ गयी कि वो हर समय उन्ही का ध्यान करती रहती।  उसका शरीर इससे धूमिल और दुबला हो गया. वो दीन सी दिखने लगी।  सहेलियों ने दमयन्ती के हृदय का भाव ताड़ लिया और जाकर महाराज को कहा कि

आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गयी है 

महाराज ने  सोच विचार कर यह निर्णय किया कि अब दमयन्ती अब विवाह योग्य हो गयी है और अब उसका स्वंयर करवा देना चाहिए।

फिर स्वयंवर का निमत्रण चारो तरफ दे दिया गया।  राजा नल तो पहले से ही दमयन्ती के प्रेम में थे, स्वयंवर का निमत्रण पाते हीं उन्होंने विदर्भ की  यात्रा की।

उधर देवर्षि ऋषि और पर्वत के द्वारा देवताओं को भी स्वयंवर का समाचार मिल गया और इन्द्रादि सभी लोकपाल भी अपनी मंडलियों के साथ विदर्भ देश के लिए चल पड़े। [ Ye Hai  महाभारत 🙂 ]

उधर आकाश मार्ग से जाते हुए देवताओं ने कामदेव के सामान सुन्दर राजा नल को स्वयंवर में जाते देखा। उनके तेज को देेख देवताओं को लगा कि स्वयंवर में दमयन्ती उनके सामने उन्हें वरण नहीं करेगी तो उन्होंने अपने विमान  को आकाश में ही खड़ा कर दिया (No airport ) और नीचे उतर कर राजा नल से बोले कि आप सत्यव्रती हैं। हमारे एक उद्देश्य के लिए आप हमारी सहयता करे और हमारे दूत बन जाइये।

राजा नल ने प्रतिज्ञा कर ली, कहा कि “करूँगा !!” और फिर पूछा …

आपलोग कौन है और मुझे दूत बन कर कौन सा काम लेना चाहते हैं….. 

 

इस पर देवताओं ने अपना परिचय दिया और कहा

हमलोग देवता हैं, मैं इंद्र, ये अग्नि, वरुण और यम हैं।  हमलोग दमयन्ती के स्वयंवर के लिए जा रहें हैं, आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइये और उनसे बताइए कि इंद्र, वरुण, अग्नि,  यमदेवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं, तुम जिसे चाहो उसका वरण कर लो।   

इस पर राजा नल ने कहा

देवतागण हम और आप एक हीं उद्देश्य से जा रहे हैं, ऐसे में मेरा आपलोगों का दूत बनकर जाना उचित नहीं होगा, फिर जिस पुरुष के अंदर किसी स्त्री को पत्नी रूप में पाने की इच्छा हो गयी हो वो उसको कैसे छोड़ सकता है, और ऐसी बात वो उससे बोलने की भला सोंच भी कैसे सकता है।

इस पर देवताओं ने राजा को उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाई और कहा

तुमने हमारे सहायता की प्रतिज्ञा की है।  अब तुम इसे तोड़ नहीं सकते। बिना विलम्ब के हीं तुम दमयन्ती के पास चले जाओ।

इस पर राजा नल ने कहा कि महल में पहरेदार होंगे वो इस तरह वहां कैसे जा सकते हैं, कोई उन्हें देख लेगा ।

इंद्र ने कहा…

जाओ ! तुम वहां जा सकोगे।  

इंद्र की आज्ञा पाकर, वो बेरोकटोक महल के अंदर प्रवेश कर गएँ, और उन्होंने वहां दमयन्ती को देखा। अचानक से उन्हें वहां देख कर दमयन्ती और उसकी सखियाँ अवाक रह गयी।  वों इस अनुपम सुन्दर मनुष्य को देखकर मुग्ध हो गयीं और लज्जित होकर कुछ बोल न सकी।

दमयन्ती ने थोड़ा संभल कर उनसे बोल …

तुम दिखने में बड़े सुन्दर और निर्दोष जान पड़ते हो, पहले तुम अपना नाम बताओ।  तुम यहाँ किस उद्देश्य से आये हो।  तुम्हे दरवाजे पे पहरेदारों ने कैसे नहीं टोका, उनसे थोड़ी भी चूक हो जाने पर  मेरे पिता महाराज उन्हें बड़ा कड़ा दण्ड देते हैं।  

फिर राजा नल ने उन्हें अपना नाम और सारा वृतांत बतलाया।  इस पर दमयन्ती रोने लगी और उसने रोतें रोतें हीं उनको वरण न करने की अवस्था में विष खा कर उनके लिए प्राण त्याग देगी ऐसा कहा. उसने कहा

“मैंने आपका वरण करने के लिए हीं राजाओं का ये जमवाड़ा यहाँ बुलवाया था… “

इस पर नल ने दमयन्ती को कहा कि

जब देवता स्वयं तुम्हारा वरण करना चाहते हैं तो तुम मुझसे अदने मनुष्य को क्यों चाहती हो।  

मगर दमयन्ती को सुनना हीं नहीं था, अंत में उसने कहा

 आप भी कल देवताओं के साथ स्वयंवर में आ जाइये।  आपने उनका काम कर दिया है, और अब मैं उनके सामने हीं आपका वरण कर लूंगी इससे आपको कोई दोष नहीं लगेगा।

राजा ने नल ने वापस जाकर देवताओं को ये बतलाया के मैंने दमयन्ती को आप लोगों के बारे में बतलाया पर वो तो आपलोगों न चाह कर मेरा हीं वरण  करने पे तुली है, उसने कहा है की वो आपलोगों के सामने हीं मेरा वरण कर लेगी, इससे मुझे कोई दोष नहीं लगेगा। अब मैंने आपलोगों का काम कर दिया इसका प्रमाण आपलोगो हीं हैं।

अगले दिन सभी लोग स्वयंवर स्थल में पंहूचे और अपने अपने आसनो में विराजमान हो गए।

तब अपने अंगकान्ति से राजाओं के मन और नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित करती, दमयन्ती रंगस्थल में आयी।  एक एक कर राजाओं का परिचय उससे कराया जाने लगा। वो सारे राजाओ को छोड़ आगे बढ़ती गयी, और एक जगह पे राजा नल के सामान हीं रूप वाले चार लोगो को एक साथ बैठे देखा। वो जिसे भी देखती वही, राजा नल जान पड़ते।

इस पर दमयन्ती को समझ में नहीं आया कि कैसे वो देवताओं में से राजा नल को पहचाने, और जब उसे कुछ समझ में नहीं आया तो वो देवताओं की  शरण में हीं चली गयी और हाथ जोड़ कर देवताओं की स्तुति करने लगे कि

…..  किस तरह हंसो से सुनकर हीं वो राजा नल के प्रेम में है …..और उन्होंने देवताओं से विनती की वो अपने आप को उसे दिखा दे।

दमयन्ती के आर्तनाद को सुनकर और उसके दृढ निश्चय, सच्चे प्रेम, आत्मशुद्दी, बुद्धि, भक्ति और नल के प्रति अनुराग को देख देवताओं ने दमयन्ती के अंदर देवता और मयुष्य में होने वाले अंतर का ज्ञान दे दिया।

दमयन्ती ने देखा कि देवताओं के शरीर में पसीना नहीं है, पलके नहीं गिरती, माला कुम्हलाते नहीं, शरीर पर मैल नहीं है, स्थिर हैं पर पाँव धरती को नहीं छूते। उधर राजा नल के शरीर की छाया बन रही थी, माल कुम्हला थोड़े कुम्हला गए थे, उनके शरीर पे थोड़ा धूल और पसीना भी था, पलके बराबर गिर रही थी और पाँव जमीन छूकर स्थिर थे।

इस तरह दमयन्ती ने उन देवताओं में राजा नल को पहचान लिया और कुछ सकुचाती हुई उनके गले में वरमाला डाल दी। देवता और महर्षि साधू साधू करने लगे और राजाओं में हाहाकार मच गया।

राजा नल को यहाँ पर देवताओं ने राज नल को आठ वर दिए वो थे

इंद्रा ने दिया तुम्हे यज्ञ में मेरे दर्शन होंगे और उत्तम गति मिलेगी, अग्नि ने कहा, तुम जहाँ मेरा स्मरण करोगे मैं वहीँ प्रकट हो जाऊँगा, और मेरे हीं सामान प्रकाशमय लोक तुम्हे प्राप्त होंगे, यमराज ने कहा तुम्हारी बनाई रसोई बहुत मीठी होगी और तुम अपने धर्म में ढृढ़ रहोगे, और वरुण ने कहा तुम जहाँ चाहोगे जल वहीँ प्रकट हो जाएगा और तुम्हारी माल कभी उत्तम गंध से परिपूर्ण रहेगी।

इसके बाद राजा नल कुछ दिनों तक विदर्भ देश के राजधानी कुण्डिनपुर (एक और नाम ) में रहे फिर राजा भीमक से अनुमति प्राप्त कर वापस अपने अपने राज्य में लौट आये, और धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करने लगे।  सचमुच उनके द्वारा राजा नाम सार्थक हो गया।  उन्होंने अनेको अश्वमेघ यज्ञ किये और समय आने पैर उनका इंद्रसेन नामक पुत्र और इंद्रसेना नामक पुत्री हुई। फिर नाम  !!

और अब next twist … but full story after a break !!

उधर जब इंद्र और देवता स्वयंवर से वापस लौट रहे थे तो उनकी भेंट रास्ते में द्वापर और कलयुग से हो गयी।

इंद्रा ने कलियुग को देख कर पूछा

क्यों कलयुग कहाँ जा रहे हो ?? 

कलयुग ने कहा

मैं दमयन्ती के स्वयंवर में उससे विवाह करने जा रहा हूँ 

इस पर इंद्र ने हँसते हुए कहा

अजी वो स्वयंवर तो कब के समाप्त हो गया।  दमयन्ती ने हमारे सामने नल वो वर कर लिया और हम ताकते हीं रह गए !! 

इस पर कलयुग ने कहा

 तब तो बहुत अनर्थ हुआ।  देवताओं की उपेक्षा कर के उसने मनुष्य को अपनाया उसे इसका दण्ड मिलना हीं चाहिए।।।

इस पर देवताओं ने कहा…

क्रमशः 

to be continued  

 

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