कुछ और पुरानी कवितायें …..

शिकायत

चलो आज मैं अपने दर्द का बयान करता हूँ
मेरी जो तुमसे शिकायत है वो खुलेआम करता हूँ

जो तू ये सोंचता था कि तू तोड़ता है गुरूर मेरा
देख तू अपने पैरों पे खड़ा रहने का ये शुरुर मेरा

तेरे से लड़ के जीतू इतना तो इकबाल नहीं मेरा
पर जिंदा हूँ अभी भी ये बुलंद खयालात है मेरा

भेज और जितने अवतारों को तू भेजता है यहाँ
तेरे पैगम्बरों से लड़ने में हीं तो रहा है वज़ूद मेरा


अलग

कब तक देखेगा तू दोष अपने आप में
इस ज़माने से हार कर जीतता नहीं कोई।

गर मान भी ले तू कि वो सही है और तू गलत
तो क्या छोड़ देंगे वो तुझे तेरे पश्चताप के लिए।

तू सोंचता है की देंगे तेरी सजा वो तुझे ऐसे
जैसे मुक्त हो जाए तू फिर उनसे सदा के लिए।

की हिम्मत हीं नहीं उनके अन्दर थी ऐसी कभी
कि वो छोड़ दे तुझे अपने आप पे तुम्हे ए दोस्त।।

उनकी तो हसरत हीं यही की तू हो जा उनसा
कबूल उनकी दुनिया उनका जहाँ उनके खुदा।

उनकी ये दुनिया है मेरे यार तू बस जान ये कि
गलत तेरा कहना की तू और और तेरी जहाँ और।

यही तो मुसीबत की जो तू ना कहीं जान जाए
राज की ये बात है कहीं जो ये समझ ना जाए।

रह लेगा तू उनसे अलग रहता रहा है तू जैसे
देखा कभी जो छोड़े हों वो तुझे भी अकेले वैसे।।


दोस्त 

यार आज एक दोस्त ने जब ऐसा बोला
की  लगता नहीं तुझसे बात करता हूँ
तेरी तो ये आवाज़ हीं बदल गयी है
तू है कौन कि तू ये ऐसा बोलता कैसे है

अरे यारो सीखा तेरी महफ़िल में हीं मैंने
ये बात की तू बोल खुल के जो बोलना है
और अगर तू बोल हीं ना पाए
मेरे साथ तो तू दोस्त कैसा है

और अगर हम तुम्हारे दोस्त हैं
तो ये दुनिया दोस्त है
तो मैंने कहीं ना कही
वो बातें बोलनी शुरू कर दी और

कर लिया तेरे बातों पे भरोसा हमने
तो छोड़ दिया खुद को रोकना हमने
और देख क्या बात हुई ये बड़ी मजेदार
लगता नहीं अब तू भी रहा अपना यार ..


उसका दरबार

क्यों तुझे खुद से कोई प्यार नहीं
क्यों ख़ुशी के लिए तू बेकरार नहीं
अगर बुलाया नहीं तुझे उसने प्यार ने
तो सोंच भला आया कैसे तू संसार में।।

तुम्ही दूर भागते थे उसके संसार से
अभी भी बुलाता तुझे वह प्यार से
एक बार देख तो जरा ऐतबार से
ऐसा भी क्या डरना उसके संसार से।।

सब हमेशा रहें हैं उसीके अधिकार में
एक बार फिर पड़ उसके प्यार में
की तैयार खड़ा वो तेरे इंतजार में
सुना है देर नहीं उसके दरबार में ।।


तू

सवाल यह नहीं है की उदास है तू
क्यों हरेक बात पे यूँ चुपचाप है तू ।।

तू बोलता था ऐसे की आवाज़ है तू
जैसे कि हर सवाल का जवाब है तू ।।

कहाँ है तेरे वो जो उबलते हुए तूफान थे
हरेक बात पे वो तेरे जो बेबाक बयान थे ।।

डरता तो तब भी तू था उन अरमानो से
पर था तू बड़ा बेजिझक कई जमानो से ।।

चाहत

ऐसा भी तो नहीं की कोई अफ़सोस नहीं मुझे
फिर भी क्यों किसी बात का होश नही मुझे ।।

जो ये देखता रहता हूँ मैं हरदम दोष तुझमे
क्यों ना खुद हीं कुछ करूँ कोई जोश मुझमे ।।

लो आई है तमन्ना कि अब भुला दूं तुझे
पर फिर बुला लेगा तू सैंकड़ो बहाने हैं तेरे ।।

नादान

मैं सोंचता था की मैंने खत्म कर दिया था वो हिस्सा
जहाँ से किसी को किसी के प्यार का एहसास होता है ।।

मैं सोंचता था की मैंने कुचल डाली हैं वो सारी इच्छाएं
जो किसी को बस हो जाती है किसी और के लिए ।।

मैं सोंचता था की तुम तो नहीं छु पाओगी मुझे वैसे
जैसे कभी और पहले किसी और ने कभी छुआ था मुझे ।।

अकेला था तब भी मैं और अब और भी ज्यादा हूँ
माँगा ना तब भी तुझे और ना अब हीं मांगता हूँ ।।

अब लगता है जैसे ये एक जूनून सा बन गया है
पहले जो डर था अब एक घर सा बन गया है ।।

सच पूछो अब चाहता ही नहीं की कभी मिटे ये दर्द
इस दर्द के एहसास से एक प्यार सा हो गया है ।।

इससे पहले की मिटे ये दर्द चाहता हूँ तू फिर आये
और जख्म जो भर सा रहा है जरा फिर दे दे ।।

ख़ुशी के लिए मेरे जो तू करता रहता है इतने सितम।
थकता नहीं क्यूं तू फिर भी सोंचता रहता हूँ मैं हरदम।।

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