सस्ती कवितायें

चूहा

तुम्हारे जो पर थे वो कल कुतर दिए हैं मैंने
फुदकने के अलावा तुम्हारे पास अब रखा क्या है।

आसमान में तो उड़ सकते नहीं हो तुम अब
और जमीन पे चलना तो सीखा नहीं है तुमने ।।

मतलब से मतलब
क्या हमारी कोई भाषा है।
क्या ये भाषा यहाँ पर मेरी होनी चाहिए थी।
क्या हमरी लिखने से उसका मतलब मेरी हो जाता।
क्या आँखों की भाषा होती है
और अगर होती है
तो क्या उसका भी व्याकरण होता है।
उसका पाणिनि कौन है ?

क्या बकवास है और क्या नहीं
इसका अंतर क्या मतलब से निकलता है।
क्या मतलब के दो मतलब नहीं होते ।
जब हम किसी बात का मतलब निकालते हैं
तो उस वक़्त मतलब का क्या मतलब होता है।
क्या यह एक कविता है जो हम गुनगुना नहीं सकते।

“य पश्यति सः पश्यति”

“य पश्यति सः पश्यति”
जो ये देखता है वह देखता है ।

देखने का मतलब क्या होता है ।
तुम कुर्सी देखते हो
या तख्ते-ताउस देखते हो।

तुम राम देखते हो
या राजा राम देखते हो ।
तुम राम का नाम देखते हो
या उसका काम भी देखते हो ।

टीवी में भी हम देखते हैं
और टीवी को भी देखते हैं।
अगर तुम आँखों से देखते हो तो हम पैरो से चलते हैं।

फिर कहीं पहुँचने का क्या मतलब हुआ
गाडी खरीदने का फिर क्या मतलब हुआ ।

देख लो

पहले बारिश होती थी
और हम बहती हुई नालियों में कागज की कश्ती चलाते थे
अब ग्रीन हो गए हैं
और रेनी डे में एनएफएस की सड़को में फेरारी चलाते हैं.

पहले हम बच्चे थे
और बोर हो जाने पर बैठकर ला मिजरेबल पढ़ते थे
अब हम बड़े हो गए हैं
और बोर होकर फेसबुक में बैठकर कविता लिखते हैं.

कोई बात नहीं यह कि
जो मैं ये कहता रहता हूँ कि सब बदल गया है
कहने से होता क्या है
जो बदलना है वो तो वैसे भी बदल हीं जाता है.

देखो मैंने बोल हीं दिया
और अपने सोंच को ज़माने के सामने खोल हीं दिया
तुम समझो या नासमझो
तुम्हारे एक सवाल का जवाब तो मैंने दे हीं दिया

सोंच या सपना

किसी ने किसी से पूछा कि बताओ
सोच और सपने में अन्तर क्या है
अन्त में इन दोनों मे आखिर अपना कौन है।
तो उसने कहा……
बिना सोच के सोच को हम सपना कहते हैं
और सोचें हुए सपने को मैं सोच कहता हूँ
कि आँखें बंद करके सोचों तो सपना है
और खुली आँखों के सपने सोच हैं ।
और तुम्हारा दुसरा जो सवाल है वो कमाल है
और उसके जवाब में लो एक और सवाल है
बताओ तो कभी सोचा है कि कहाँ से आता है
तुम्हारे दिल का जो ये मजाल है…….

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