लाइन आ गया ….

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“A picture is worth a thousand words”

कल वही हुआ जो अक्सर हमलोगों के साथ होते आया है। मोहल्ले के सारे घरों में बिजली थी, सिवाय हमारे घर के। और जो भी इस बात का मर्म जानतें हैं, उन्हें पता होगा यह कितना बैचैन कर देने वाला समय होता है!!!

और उस वक़्त आप किसी भी कीमत में अपने घर में बिजली चाहतें हैं!! हालांकी इस बार बिजली हमारे पुरे फेज की नहीं थी, मगर फिर भी ऐसा फेज हमेशा हमारा वाला फेज हीं क्यों होता है यार!!

और ऐसे मौके पे मेरे अन्दर एक सवाल आया… 

“अरे हमलोगों के यहाँ दोनों फेज का लाइन नहीं है क्या !!! “

क्योंकी अक्सर हीं, कम से कम हमलोग इस तरह के शुद्ध सरकारी प्रिविलेज से मरहूम तो नहीं हीं रहते थे कभी भी!!

तब इस फेज और बिजली के चक्कर में हमलोग बिजली ऑफिस गए।

इस छोटी सी यात्रा ने मुझे, बिजली के साथ विकास के नाते की जो एक अकादमिक बहस है, उसको थोडा अपने lived एक्सपीरियंस से जोड़ कर देखे जाने की एक अद्भुत प्रेरणा दी है।

बिजली का ज़िन्दगी में क्या महत्व है, इस बात को मैं थोड़ी ज्यादा गंभीरता से समझने का दावा रख सकता हूँ।

मैंने अपनी ज़िन्दगी में ठीक-ठाक समय, उम्र के करीब हर पड़ाव में, चाहे बचपन हो, किशोरावस्था हो या जवानी, ठीक-ठाक समय हर तरह के जगहों में बिताया है, चाहे जहाँ …

1. चौबिसों घंटे बिजली है!!!

2. अथवा जहाँ बिजली हैं हीं नहीं!!! मतलब पोल वोल भी नहीं है, और दूर-दूर तक पोल नहीं हैं!!! मतलब लालटेन, पेट्रोमेक्स, डिबरी वगैरह ज़िन्दगी का एक हिस्सा है। और एक ज़माने में यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ बिहार में ऐसे बड़े-बड़े क्षेत्र थे जहाँ या तो बिजली के पोल हीं नहीं थे अथवा थे भी तो उनमे उद्घाटन के बाद फिर जो ट्रांसफार्मर उड़ा तो कभी लाइन आयी हीं नहीं दुबारा। लालू ने ऐसे हीं लालटेन छाप से हंगामा नहीं मचा दिया था बिहार में !! 

3. जहाँ ठीक-ठाक बिजली रहती है, टाइम पे लोड-शेडिंग होती है, जैसे 6-7 शाम या 8-10 सुबह।।

4. या ऐसी जगह जहाँ बिजली ठीक-ठाक है, कोई नियम नहीं हैं, जा भी सकती है पर अक्सर रहती है पर कोई गारेन्टी नहीं है,

5. या जहाँ 24 घंटे में 2-6 घंटे बिजली है, वैसा जैसे लगता है गुजरात था मोदी जी के पहले। क्योंकि उनको मैंने अक्सर ये कहते सुना कि कैसे उनके मुख्यमंत्रित्व काल के प्रारंभ में लोग कहा करते थे…

“मोदी जी कुछ करो या न करो , मगर रात में जब खाना खाने बैठे , तब तो तो बिजली हो, इतना तो कर दो!!!”

तो वैसी जगह जहाँ बिजली ज्यादातर नदारद हीं रहती है…

इन सभी जगहों की एक अपनी दुनिया है।

पता नहीं कितने लोगों को ये थ्रिलिंग लगेगा कि जब मैच होना हो तो भारत जीते, या टीम में कौन खेल रहा है या किसको खेलना चाहिए से परे भी एक चिंता है और वो है…

यार!! मैच के समय कहीं लाइन ना काट जाए….!!

एक दर्दनाक अनुभव जो याद है, वो है हीरो कप का सेमी फाइनल। तेंदुलकर का वो ओवर!! गया में थे हमलोग उस वक़्त। ए पी कॉलोनी मे…

एक अलग मुसीबत थी। लाइन थी, मगर हमलोगों के घर या फेज में हीं वोल्टेज इतना ज्यादा था कि आप कोई इलेक्ट्रिक एप्लायंसेज यहाँ तक की बल्ब भी नहीं जला सकते थे!!!

आखिरी ओवर, वो क्लाइमेक्स वाला, आते-आते आखिरकार स्टेबलाइजर ने जवाब दे दिया, और फाइनली टीवी बंद हो गया।

दिन होता तो कहीं दूसरों के घर भाग जाते, पर घर में जेल की तरह सूर्योदय से सूर्यास्त वाला नीयम था, और रात के दस-वस  बज रहे होंगे!!

रेडियो का खोजइया शुरू हुआ !! और अगर खराब निकला तो अलग डांट !!

देखिये और जगहों में मतलब, नॉन ऑफिसर कॉलोनी वाले मकानो में लाइन है, उनका वोल्टेज ठीक है, हमलोग अँधेरे में, मोमबत्ती की रोशनी को आप अँधेरा हीं कहेंगे, रेडियो पे हैं और वो भी एक जमाने के बाद खुला है और जल्दी-जल्दी में स्टेशन पकड़वा लेना मज़ाक नहीं हैं।

अब यहाँ जिनके पास टीवी है, वो लाइव देख रहें हैं, बीट होता, वो झट से देख लेते कि  बीट हो गया, और हल्ला शुरू होता पर हम तो कमेंटेटर के कमेंट के मोहताज है!!

जैसे हीं बीट होता, अगल बगल हल्ला हो जाता, टीवी पे लाइव दिखायी जा रही थी, हमें कमेन्ट्री और आस -पास के हल्लो में से, दोनों जगहों से इनफार्मेशन मिल रही थी।

तेंदुलकर ने क्या शानदार 6 बाल डाले। बिलकुल उस 92 के ऑस्ट्रेलिया दौरे के वेस्ट इंडीज वाले मैच की याद ताज़ा करा दी, जिसमे हालाँकि तेंदुलकर ने एक हीं बॉल फेका था और अज़हर ने क्या कैच लिया था !! याद है?? खैर अगर आपको इस मैच का याद हो, तो याद होगा मैकमिलन खड़ा रह गया दुसरे छोड़ पे और भारत जीत गया। खुशी की बात थी मगर हमारा हार्ट फेल नहीं हुआ, ये काम आश्चर्य भी नहीं है।

या जब एक बार घाटशिला में ट्रांसफार्मर उड़ गया था, तो करीब दो महीने तक एक शहर में हम बिना लाइन के थे। शाम को जब हमलोग क्रिकेट खेल के वापस घर आतें तो थे तो, हमे पता था कि लाइन नहीं आएगी।

मतलब अब ऐसा नहीं था कि आप शाम में घर लौट के आएं और लाइन कटा हुआ है बोलके आपको और थोड़ी देर बाहर आस पास में हीं कॉलोनी में थोड़ा और आवारागर्दी करने का मौका मिल गया हो।

ऐसा नहीं होगा क्योंकि बिजली तो आनी हीं नहीं है, इस कारण जल्दी लौटना बल्कि अब एक जरूरत थी। घर आओ!! लालटेन वालटेन का हाल देखो !! जी सर लालटेन!! 

लालु यादव का चुनाव चिन्ह गरीबी की नहीं, प्रतिष्ठा का सिंबल था वो। अपना अलग लालटेन होना टेबल लैंप होने से कम नहीं तो उसके बराबर बात मानी जाती थी। ऐसे कितने लोगों को मैं पर्सनली जानता हूँ जो अपने छमाही के अच्छे नम्बरो का पूरा श्रेय नए लालटेन को देते थे!!!

शुरू में बहुत हल्ला हुआ। तरह-तरह के अफवाह उड़े !!

कल बन जाएगा !! आज टाटा से देख के गया है!! HCL वाला लोग दे रहा है से लेकर के TV टावर वाला दे रहा है, ये-वो सब कुछ !! बस PIL का वैसा ज़माना नहीं था, मेरे ख़याल से 94 ईश्वी की बात  है, नहीं तो हाई कोर्ट दे रहा है वाला हल्ला भी हो जाता!!

खैर कुछ नहीं हुआ और 20-25 दिनों के बाद सभी लोग हार गए। यहाँ तक की अफवाह फैलाने वाले भी हार कर चुप हो गएँ.

जो बिजली ना होने के कारण जो अक्सर हीं एक उदासी छाई रहती थी वो उदासी भी लोग भूल गए!! मतलब लोग भूल गएँ की बिजली भी कोई चीज़ होती है.

सचमुच इंसानो के एडजस्ट और एडाप्ट करने के क्षमता बड़ी आश्चयर्जनक और अविश्वासनीय है!!

इन्वर्टर का तो सवाल हीं बेकार है, घर में थी भी नहीं और जिनकी थी भी, बिजली तो पिछले एक महीने से नहीं थी, वो कब के बैठ चुके थे…

और घाटशिला शहर, पता नहीं अभी कैसा है, उस वक़्त तीन हिस्सों में बटा था। एक था माइनिंग कॉपर कंपनी वाला इलाका, जहाँ २४ घंटे बिजली-पानी थी, दूसरा बाजार इलाका और तीसरा फुलडूँगरी; जहाँ पे कोर्ट और ब्लॉक ऑफिस थी, सरकारी ऑफिस वाला इलाका मतलब, जहाँ अफसर कॉलोनी थी, जहाँ हमलोग रहते थे, और ट्रांसफार्मर सिर्फ फुलडूँगरी इलाके का, जहाँ हमारा घर था, का उडा था. वैसे तो फुलडूँगरी बड़ा इलाका था, मगर बाजार वाला इलाका नहीं था…

अब देखिये चूंकि ज्यादातर इलाका जो इस उड़े हुए ट्रांसफार्मर की सीमा क्षेत्र में आता था, वो ऑफिस वाले थे, जहाँ दिन में लाइट की जरूरत थी नहीं, उस वक़्त टाइप राइटर का ज़माना था, प्रिंट आउट का नहीं!! पता नहीं ज़ेरॉक्स-वेरोक्स कैसे होता था, या पता नहीं लोग कार्बोन कॉपी या अठारहवीं सदी में पूरी तरह से लौट कर “नक़ल” पे उतर आएं थे, याद नहीं अब!! बात असली वो नहीं है यहां…

बाजार का उड़ता तो दूकान वाले लोग या जनरल मोहल्ले वाले भी खटा-खट चंदा इकठ्ठा करके सामूहिक रिश्वतखोरी के लिए पैसा जुगाड़ कर लेते!! मगर यहाँ तो ज्यादातर सरकारी ऑफिस वाले थे, अब वहां पे जो कुछ एक लोकल पब्लिक थी भी वो अब कैसे मतलब इन सरकारी अधिकारियों से चंदा मांगे !!

 मुसीबत बड़ी थी।  

क्रमशः !!! 

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